सांग उत्सव के दूसरे दिन सोमवार शाम टैगोर थिएटर में कीचक वध सांग को मंचित किया गया। सूचना, जनसंपर्क एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा की ओर से टैगोर थिएटर में आयोजित हुए इस सांग का निर्देशन पंडित विष्णु दत्त सांगी ने किया।
सांग की शुरुआत पांडवों के 12 वर्ष जंगल में बिता देने के बाद होती है। इसके बाद पांडव को एक साल अज्ञातवास में रहना पड़ता है। इस दौरान सांग में बताया गया कि किस तरह पांडव भेष बदलकर मत्स्य देश के राजा विराट के यहां नौकरी करने लगे और द्रौपदी सैरंध्री के रूप में रानी सुदेष्णा की दासी बन कर रहने लगी।
एक दिन राजा विराट का साला कीचक अपनी बहन सुदेष्णा से मिलने आता है तो एकाएक उसकी नजर सैरंध्री पर पड़ती है। इसके बाद वह सैरंध्री पर बुरी नजर रखने लगता है। सैरंध्री बनी द्रौपदी उसकी बुरी नजर को भांप जाती है और राजा विराट और रानी सुदेष्णा से इसकी शिकायत करती है। परंतु वह दोनों उसकी बात को अनसुना कर देते हैं, जिससे तंग आकर एक दिन द्रौपदी भीम को इसके बारे में बताती हैं। भीम गुस्से में भड़क उठता है और कीचक का वध कर देते हैं।