देश की न्यायपालिका द्वारा लिए गए फैसले और दिए गए निर्देश महज आम आदमी को ही नहीं, समूचे तंत्र को प्रभावित करते हैं। साल 2018 में ऐसे ही कुछ फैसले लिए गए, जो नजीर बने।
रेप पीड़िता का बयान वेद वाक्य नहीं, जिसे बिना अपवाद के स्वीकार किया जाए
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
रेप पीड़िता का बयान कोई वेद वाक्य नहीं है, जिसे बिना किसी अपवाद के स्वीकार कर लिया जाए। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने रेप के मामले में दोषी करार दिए गए व्यक्ति की याचिका को मंजूर करते हुए स्पष्ट कर दिया कि रेप पीड़िता का बयान वेद वाक्य नहीं है। घटना के समय की परिस्थितियां और बयान की विश्वसनीयता देखना कोर्ट का दायित्व बनता है। मामला एक बेटी द्वारा पिता पर रेप के आरोप लगाने से आरंभ होता है।
अमृतसर निवासी 17 वर्षीय पीड़िता ने 10 जून 2013 को पुलिस को शिकायत दी थी कि उसके पिता ने उसके साथ 8 जून को सुबह साढ़े पांच बजे रेप किया। उस समय उसके भाई-बहन स्कूल गए थे और उसकी मां की मानसिक हालत ठीक न होने के कारण वह घर से बाहर थीं। मौके का फायदा उठाकर पिता ने उसके साथ रेप किया और यह सिलसिला पिछले दो साल से चल रहा है। इसके बारे में उसने अपने भाई -बहन को भी बताया था परंतु उन्होंने उसे शिकायत करने से मना कर दिया। पीड़िता ने कहा उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर दो दिन बाद शिकायत दी।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज करते हुए पिता को गिरफ्तार कर लिया और पीड़िता का मेडिकल करवाया। इसके बाद जिला अदालत ने पिता को दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई और साथ ही 5 हजार का जुर्माना लगाया। पिता ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए एडवोकेट बलबीर सिंह जसवाल के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याची ने कहा कि वह रिक्शा चलाता है और सुबह घर से जल्दी निकल कर देर रात लौटता है। बेटी के अनैतिक गतिविधियों में लिप्त होने के कारण वह उसे डांटता था जिसके चलते उसने याची के खिलाफ रेप की शिकायत दे दी।
याची ने कहा कि पूरा परिवार एक ही कमरे में रहता है और जिस दिन रेप की बात की जा रही है उस दिन छुट्टी थी और ऐसे में सभी सदस्य घर पर ही मौजूद थे। ऐसे मे बयानों में सीधे तौर पर विरोधाभास है। साथ ही मेडिकल एविडेंस भी पीड़िता के खिलाफ हैं और ताजा संबंध बनने की बात भी उनमें साबित नहीं हुई। हाईकोर्ट ने याचिका को मंजूर करते हुए याची को निर्दोष करार देते हुए जिला अदालत के आदेश खारिज कर दिया हैं तथा पिता को बरी करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने आदेशों में कहा कि निश्चित रूप से रेप पीड़िता के बयान के आधार पर सजा दी जा सकती है, लेकिन रेप पीड़िता का बयान को वेद वाक्य नहीं है जिसे बिना किसी अपवाद के स्वीकार कर लिया जाए। न्यायालय की जिम्मेदारी बनती है कि वे परिस्थितियों बयानों की विश्वसनीयता को देखने के बाद ही आदेश जारी करें।
बाल विवाह कानून मुस्लिम जोड़े पर लागू नहीं
child marriage
मुस्लिम जोड़े पर बाल विवाह निषेध अधिनियम लागू नहीं होता है। यदि दोनों ने यौन परिपक्वता हासिल कर ली है और 15 साल से ज्यादा आयु है तो वे परिजनों की मर्जी के खिलाफ जाकर निकाह कर सकते हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह फैसला प्रोटेक्शन होम में मौजूद 16 साल की पत्नी को वापस पाने के लिए पति की ओर से दाखिल की गई याचिका पर सुनाया।
याचिका दाखिल करते हुए मेवात निवासी मोहम्मद शमीम ने हाईकोर्ट को बताया कि 3 जून को उसकी शादी हुई थी और इसके बाद सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट में याचिका दी थी। हाईकोर्ट ने मेवात के एसपी को दोनों की सुरक्षा को लेकर निर्णय लेने के आदेश दिए थे। इसके बाद दोनों को प्रोटेक्शन होम में रखा गया। इसी बीच याची के खिलाफ उसकी पत्नी के परिजनों ने मामला दर्ज करवा दिया था। पुलिस ने याची को गिरफ्तार कर लिया था और बाद में निचली कोर्ट ने जमानत दे दी थी।
जब याची ने उसकी पत्नी को प्रोटेक्शन होम से वापस लाने का प्रयास किया तो पुलिस ने उसके नाबालिग होने की बात कहते हुए उसकी कस्टडी सौंपने से इनकार कर दिया। याची ने पुलिस की हिरासत से पत्नी को छुड़ाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने इस याचिका पर बेहद अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि यह मामला एक मुस्लिम जोड़े का है। मुस्लिम धर्म के अकील अहमद की प्यूबेरिटी एंड मेजोरिटी पुस्तक के अनुसार यौन परिपक्वता पाने के बाद कोई भी लड़का या लड़की जिससे चाहे शादी कर सकता है और इसमें अभिभावकों की मंजूरी जरूरी नहीं है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि निकाह मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट 1937 के तहत हुआ है जो एक स्पेशल एक्ट है। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 एक सामान्य एक्ट है। जहां पर भी स्पेशल एक्ट होता है वहां पर सामान्य एक्ट प्रभावहीन होता है। ऐसे में लड़की की आयु 16 साल थी इस आधार पर उसकी शादी को अवैध नहीं माना जा सकता। मुस्लिम जोड़े की शादी की स्थिति में उनकी यौन परिपक्वता ही न्यूनतम आयु है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस को याची की पत्नी को उसे सौंपने के आदेश दिए हैं।
शहीद सैनिकों के हकों को लेकर ऐतिहासिक फैसला
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शहीद सैनिकों के हकों को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसे जानना हर किसी के लिए जरूरी है। युद्ध संभावित क्षेत्र में जवान शहीद हुआ, भले ही कोई हमला हो या पेट्रोलिंग के दौरान हादसे से। शहीद तो शहीद ही है आखिर मौजूद तो वह देश की रक्षा के लिए ही था। ऐसे में उसे उसका हक देना राज्य सरकार का धर्म बनता है।
यह टिप्पणी करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की ओर से सैनिक के परिजनों को एक्सग्रेशिया का लाभ देने के सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। रीता सैकिया ने एडवोकेट अरुण सिंगला के माध्यम से सिंगल बेंच के समक्ष याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि उसके पति 22 अप्रैल 2008 से 11 अगस्त 2010 तक भारत सरकार के ऑपरेशन रक्षक के तहत जम्मू कश्मीर में बॉर्डर पर युद्ध संभावित क्षेत्र में तैनात थे।
11 अगस्त की रात को भारी बारिश के दौरान वे पेट्रोलिंग ड्यूटी पर थे और इस दौरान बारिश के चलते बंकर गिर गया और उसके पति शहीद हो गए। इसके बाद सेना की ओर से उन्हें फैमिली पेंशन आरंभ कर दी गई, जिसे आर्म फोर्स ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई। ट्रिब्यूनल ने उनके हक में फैसला सुनाते हुए शहीद पेंशन के लिए हकदार माना था। इसके बाद परिजनों ने हरियाणा सरकार की युद्ध क्षेत्र में शहीद होने वालों के लिए बनाई गई 10 लाख की एक्सग्रेशिया ग्रांट के लिए आवेदन किया।
हरियाणा सरकार ने इसे यह कहते हुए इनकार कर दिया कि दिलीप की मौत न तो किसी आतंकी हमले में हुई है और न ही किसी ब्लास्ट में। कर में सोते हुए बंकर गिरने से हुई मौत के लिए इस ग्रांट को जारी नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट के जस्टिस एमएमएस बेदी ने हरियाणा सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए कहा था कि पीड़ित परिवार इस ग्रांट का हकदार है और ऐसे में हरियाणा सरकार 3 माह के भीतर इस ग्रांट को जारी करे।
इस फैसले के खिलाफ हरियाणा सरकार ने अपील दाखिल की थी। अपील में देरी होने के चलते पहले इस देरी की माफी के लिए अर्जी दाखिल की थी। इस अर्जी को ही हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज करते हुए कहा कि शहीद का हक सरकार कैसे छीन सकती है। सैनिक युद्ध के हालातों से निपटने केलिए जान दांव पर लगाकर सीमा पर मौजूद होते हैं। यदि इस प्रकार का सरकार का रवैया होगा तो यह हतोत्साहित करने वाला है। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।
मोटर एक्सीडेंट क्लेम को लेकर अहम फैसला
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मोटर एक्सीडेंट क्लेम को लेकर दाखिल एक याचिका का निपटारा करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि मांगे गए वाहन से कोई दुर्घटना होती है तो बीमा कंपनी उसके क्लेम के भुगतान के लिए जिम्मेदार नहीं है।
नारनौल के हरिंदर सिंह से बाइक मांगकर वहीं का योगेंद्र अपने साथी नरेश के साथ जा रहा था। इसी बीच रास्ते में नीलगाय के आने के एक्सीडेंट हो गया। हादसे में योगेंद्र की मौत हो गई। उसके परिजनों ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल करते हुए मुआवजे की मांग की। इस पर ट्रिब्यूनल ने क्लेम को खारिज कर दिया। इसके खिलाफ परिजनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन का पर्सनल एक्सीडेंट कवर बीमा था। इस स्थिति में कंपनी केवल मालिक के साथ कोई दुर्घटना होने की स्थिति में मुआवजा देने को बाध्य है। भले ही कोई व्यक्ति किसी का वाहन लेकर जाता है और उसके पास वैध लाइसेंस होता है तो भी वह ऑनर ड्राइवर की परिभाषा में नहीं आता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऑनर ड्राइवर की परिभाषा मोटर व्हीकल एक्ट में स्पष्ट की गई है। ऐेसे में इसमें न तो कोई शब्द जोड़ा जा सकता है और न ही इसमें से हटाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रिब्यूनल ने क्लेम को सही खारिज किया है। उसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी का वाहन लेकर जाता है तो वह उसका मालिक नहीं हो जाता।
केवल वैध लाइसेंस होना मालिकाना हक की पुष्टि नहीं करता है। जिस वाहन पर वह सवार थे उसका किसी अन्य वाहन से एक्सीडेंट नहीं हुआ और ऐसे में नो फाल्ट का मामला बनता है। इसलिए बीमा कंपनी मुआवजे की राशि देने केलिए बाध्य नहीं है। हालांकि नो फाल्ट की स्थिति में हरियाणा सरकार ने 50 हजार रुपये मुआवजा राशि तय की है।
यह राशि पाने के लिए पीड़ित के परिजन हकदार हैं। हाईकोर्ट ने मृतक के परिजनों को 50 हजार रुपये मुआवजा मंजूर करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
ट्रेन टिकट को लेकर ऐतिहासिक फैसला
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ट्रेन टिकट को लेकर हाईकोर्ट ने बेहद ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अगर आप भी रेल में सफर करते हैं, तो यह खबर जरूर पढ़ें और संभल कर रहें। रेल यात्रा के दौरान टिकट चेक करने की जिम्मेदारी रेलवे की होती है। यदि किसी व्यक्ति का शव रेलवे ट्रैक पर मिले और उसकी मौत रेल हादसे से हो तो ऐसी स्थिति में उसके पास से टिकट न मिलना उसके परिजनों को मुआवजे से वंचित रखने का कारण नहीं हो सकता है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रेलवे ट्रिब्यूनल को याची को चार लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट का यह अहम आदेश सुमन शर्मा की याचिका का निपटारा करते हुए आया है। मूल रूप से हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश ) और वर्तमान में चंडीगढ़ निवासी सुमन शर्मा ने याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि उसके पति राजेंद्र शर्मा 1 मई 2008 को अंबाला से कालका ट्रेन से जा रहे थे। इसके बारे में उन्होंने याची को फोन पर सूचित किया था।
अचानक उन्हें पुलिस से सूचना मिली की उनके पति का शव कालका चंडीमंदिर के बीच ट्रैक पर मिला। सुमन ने बताया कि इसके बाद उन्होंने मुआवजे के लिए रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल कर दी। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि टिकट न होने के चलते मृतक को वैध यात्री नहीं माना जा सकता। इसके बाद सुमन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को गलत मानते हुए कहा कि महज शव के पास टिकट न मिलना मृतक के परिजनों को मुआवजे से वंचित रखने के लिए काफी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि रेलवे को यह साबित करना होगा कि यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहा था। कोर्ट ने कहा कि रेल यात्रा के दौरान टिकट की जांच होती है और यह जिम्मेदारी रेलवे की है। अंबाला से कालका 60 किलोमीटर का सफर है और यात्री लगभग अपना सफर पूरा कर चुका था जहां उसका शव पाया गया।
ऐसे में रेलवे इसे साबित करने में नाकाम रहा कि यात्री बेटिकट यात्रा कर रहा था। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 4 लाख रुपये मुआवजा जारी करने के आदेश भी दिए हैं।
सेहरा बांधने से पहले अब पूरी करनी पड़ सकती है ये शर्त, तभी मिलेगी दुल्हन
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सेहरा बांधने से पहले अब युवाओं को एक शर्त पूरी करनी पड़ सकती है, उसके बाद ही दुल्हन मिलेगी। दरअसल, घोड़ी चढ़ने से पहले दूल्हे को डोप टेस्ट देना पड़ सकता है। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में चंडीगढ़ प्रशासन ने कहा है कि वह इसके लिए तैयार है। ऐसे में अगर ये व्यवस्था लागू हुई तो चंडीगढ़ ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य होगा। हालांकि इस मंजूरी को दूल्हे ही इच्छा पर छोड़ा गया है।
नशे के कारण बर्बाद होते परिवारों की बढ़ती संख्या देखते हुए यह प्रस्ताव रखा गया है। जस्टिस रितु बाहरी ने नशे से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ को आदेश दिया था कि सिविल अस्पतालों में क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था की जा रही कि घोड़ी चढ़ने से पहले दूल्हों का डोप टेस्ट करवाया जाए। उनका कहना था कि कोर्ट में आने वाले अधिकतर पारिवारिक विवादों में नशे का सेवन परिवारों को तोड़ने का कारण बनता है।
ऐसे में शादी से पहले यह जांच लेना जरूरी होना चाहिए कि दूल्हा नशा करता है। यह व्यवस्था परिवारों को टूटने से बचाने में मददगार साबित हो सकती है। इसके बाद यूटी प्रशासन के वकील सुकांत गुप्ता ने कोर्ट को सूचित किया टेस्ट कराने में कोई समस्या नहीं है, बशर्ते दूल्हे की सहमति हो। पंजाब और हरियाणा ने भी इस विषय पर अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखा है। हालांकि दोनों ने अपने पक्ष को सार्वजनिक नहीं किया है।
कोर्ट ने साल 2017 में टिप्पणी की थी कि अधिकतर पारिवारिक विवाद की वजह नशा था। यदि शहर में डोप टेस्ट का सेटअप तैयार हो जाता है तो इस प्रकार की व्यवस्था लागू करने वाला पहला राज्य होगा। हालांकि अगली सुनवाई पर हरियाणा और पंजाब सरकार का पक्ष भी सार्वजनिक हो सकता है।
नौकरी के लिए आवेदन करने वालों पर आपराधिक मामलों पर अहम फैसला
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नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान यदि आवेदक पर आपराधिक मामला दर्ज हो और वह बेनिफिट ऑफ डाउट के चलते बरी हो जाता है तो भी आवेदक नियुक्ति का हकदार नहीं है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भारत सरकार द्वारा सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील को मंजूर करते हुए यह आदेश जारी किया है।
महेंद्रगढ़ निवासी सतीश कुमार का चयन सीआईएसएफ में हुआ था और उसे ट्रेनिंग पर भेजा गया था। इस दौरान 24 अक्तूबर 2011 को उसपर एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ। इसके चलते 3 दिसंबर को उसे गिरफ्तार कर लिया गया। आपराधिक मामले में लिप्त होने के चलते सीआईएसएफ ने सतीष को सेवामुक्त करने का फैसला ले लिया।
इस फैसले को चुनौती देते हुए सतीष ने सिंगल बेंच के समक्ष याचिका दाखिल की थी। सिंगल बेंच ने सीआईएसएफ को आदेश दिए थे कि याची की रिप्रेजेंटेशन पर दो माह में याची का पक्ष सुन फैसला करें। सीआईएसएफ ने याची की रिप्रेजेंटेशन पर सुनवाई करते हुए उसे खारिज कर दिया। इसके बाद याची ने सिंगल बेंच के समक्ष याचिका दाखिल की।
इस याचिका को मंजूर करते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने याची को नियुक्ति के लिए योग्य माना। साथ ही सीआईएसएफ को आदेश दिए कि याची बरी हो गया है तो उसे नियुक्ति दी जाए। इस पर सीआईएसएफ की ओर से केंद्र सरकार ने सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच के समक्ष याचिका दाखिल की।
डिवीजन बेंच ने याचिका को मंजूर करते हुए कहा कि भले ही याची आपराधिक मामले में बरी हो गया है, लेकिन उसे बेनिफिट ऑफ डाउट के तहत बरी किया गया है। ऐसे में याची को संवेदनशील सीआईएसएफ जैसी नौकरी के लिए योग्य नहीं माना जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याची ने बेसिक ट्रेनिंग तक पूरी नहीं की थी और साथ ही हत्या जैसे गंभीर मामले में उसे आरोपी बनाया गया था। कोर्ट ने यह भी माना की सीआईएसएफ के पास अधिकार है कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान यदि वह किसी को अयोग्य पाए तो उसे निकाल सकते हैं। साथ ही प्रोबेशन का समय इस प्रकार की स्थिति के लिए होता है, जिसमें नियुक्ति व्यक्ति को समझा जा सके कि उसकी सेवाओं को आगे बढ़ाना है या नहीं।
विवाहित बेटी अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए पात्र नहीं है
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विवाहित बेटी को अनुकंपा आधार पर नौकरी नहीं दी जा सकती है। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने एक याचिका का निपटारा करते हुए यह बड़ा फैसला सुनाया है। विवाहित बेटी को नौकरी देने से मृतक के आश्रित परिवार को कोई वित्तीय लाभ नहीं मिलता, जो अनुकंपा आधार पर नौकरी देने का मुख्य उद्देश्य है। अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की नीति मृतक के आश्रितों को वित्तीय संकट की स्थिति से उबारने के लिए बनाई गई है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह अहम आदेश गुरप्रीत कौर की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया है। याचिका दाखिल करते हुए गुरप्रीत कौर ने कहा था कि उसके पिता पंजाब में जेबीटी अध्यापक थे और उनकी मौत 17 अगस्त 2001 को हो गई थी। 11 दिसंबर 2001 को याची ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था जो ऑब्जेशन लगकर वापस आ गया।
इसके बाद 7 मई 2002 को फिर से आवेदन किया गया जिसका 2012 में इसका जवाब आया कि उसका आवेदन पत्र ट्रेस नहीं हो पा रहा है। इसके बाद जनवरी 2012 में फिर से आवेदन किया गया जिसे 4 जून 2014 को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि याची की शादी हो चुकी है। सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया जिसके बाद याचिका सुनवाई के लिए डिवीजन बेंच के समक्ष पहुंची।
डिवीजन बेंच ने भी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याची का जन्म 1984 में हुआ था और ऐसे में 2001 में आवेदन के दौरान वह नाबालिग थी। 2002 में आवेदन किया और वह तब भी नाबालिग थी। इसके बाद वह 20012 तक चुप रही। इस दौरान उसने हायर एजुकेशन भी हासिल की। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा आधार पर नौकरी के लिए इतने लंबे समय का अंतराल वैध नहीं है।
दूसरी बात यह कि परिवार की खराब वित्तीय स्थिति सुधारने केलिए अनुकंपा आधार पर नौकरी दी जाती है। याची ने हायर एजुकेशन हासिल की जिससे साबित होता है कि परिवार की वित्तीय स्थिति बेहतर हो चुकी थी। इसके बाद 2012 में उसने शादी कर ली। ऐसे में यदि उसे नौकरी दी भी जाए तो वह अपने पति से जुड़े परिवार को मदद करेगी न की उसके मृतक पिता द्वारा छोड़े गए आश्रितों को इसका लाभ मिलेगा।
ऐसे में अनुकंपा आधार पर नौकरी देने का उद्देश्य ही नहीं पूरा होगा जो मृतक कर्मी के आश्रित परिवार को आर्थिक मदद देना है। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
पासपोर्ट बनवाना है, पर क्या ये नया नियम जानते हैं, कनेक्शन पिता से है
पासपोर्ट
पासपोर्ट में पिता के नाम के स्थान पर केवल बॉयोलॉजिकल पिता का नाम लिखना जरूरी नहीं है, बल्कि आवेदक का पालन-पोषण करने वाले सौतेले पिता का नाम भी लिखा जा सकता है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की डबल बेंच ने ऐसे एक मामले में सिंगल बेंच के फैसले के पलटते हुए साफ कर दिया है कि वास्तविक पिता के स्थान पर सौतेले पिता का नाम अंकित कर पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने चंडीगढ़ क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी कार्यालय और हाईकोर्ट की एकल बेंच के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पासपोर्ट में उसके वास्तविक पिता की जगह सौतेले पिता का नाम दर्ज करने से इंकार कर दिया गया था। एकल बेंच द्वारा पासपोर्ट कार्यालय के फैसले से सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता की अपील को खारिज कर दिया गया, तो याची ने इस फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती दी, जिसमें वह जीत गया।
बता दें कि हरियाणा के रोहतक में पासपोर्ट सेवा केंद्र शुरू हो गया है, जिसका उद्घाटन आज विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने किया। तकनीकी गुणवत्ता परखने के लिए पांच आवेदकों के दस्तावेज जमा करवाकर ट्रायल लिया। रोहतक के मुख्य डाकघर परिसर में पासपोर्ट सेवा केंद्र खुल रहा है। मंगलवार को दिल्ली से आए विदेश मंत्रालय और दिल्ली पासपोर्ट ऑफिस के अधिकारियों ने केंद्र का निरीक्षण कर जरूरी दिशा-निर्देश दिए।