इस दौरान उन्होंने सुनने की क्षमता में समस्या से पीड़ित बच्चों की जांच और इलाज के बारे में लोगों को जागरूक किया। उन्होंने कहा कि यूएसए, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और यूके जैसे देशों में यूएनएचएस का काफी प्रसार हो चुका है, लेकिन भारत में अभी भी नवजात शिशुओं के लिए जांच कार्यक्रम नहीं बना है।
ब्रेट ली ने कहा कि भारत में केरल यह एकमात्र राज्य है जहां सभी सरकारी अस्पतालों में यूएनएसएच को 98 प्रतिशत सफलता मिली है। केरल सोशल सिक्युरिटी मिशन ने ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित किया है, जिसमें जिन नवजात शिशुओं की जांच की जाती है, उनकी जानकारी जमा की जाती है।
केरल के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और राजस्थान में भी कॉक्लियर इम्प्लांट (सीआई) प्रोग्राम चलाया जाता है। इस मौके पर करनाल मेडिकल सेंटर के ईएनटी कंसल्टेंट सर्जन डॉ. संजय खन्ना, आईएमए प्रेसिडेंट डॉ. इकबाल सिंह और सेक्रेटरी डॉ. तेजिंदर खन्ना ने भी हरियाणा और पड़ोसी क्षेत्र में लोगों की सुनने की क्षमता बरकरार रखे जाने के विषय पर अपने विचार प्रकट किए।
दुनियाभर में बहरेपन की समस्या से पीड़ित 466 मिलियन लोगों में से 34 मिलियन बच्चे हैं। सभी नवजात शिशुओं की सुनने की क्षमता की जांच जन्म के समय ही की जाए, यह सुनिश्चित करना यूएनएसएच का उद्देश्य है।
डॉ. संजय खन्ना ने बताया, हरियाणा में 11 लाख से ज्यादा लोग बहरेपन की किसी न किसी समस्या से पीड़ित हैं और यह संख्या बढ़ती जा रही है। इसे रोकने के लिए हरियाणा में यूनिवर्सल न्यूबॉर्न हियरिंग स्क्रीनिंग (यूएनएचएस) प्रोग्राम की तुरंत जरूरत है।
बचपन में थी दिक्कत, इंप्लांट के बाद अब खुद बनेगा सर्जन
प्यांशु जिंदल मुक्तसर का निवासी कॉक्लियर इम्प्लांट रेसिपियंट है। अपने अनुभवों को सभी के साथ साझा करते हुए उसने बताया कि कैसे कॉक्लियर इंप्लांट ने उसकी जिंदगी बदल दी। जब वह चार साल का था तो आपरेशन कराया था, अब बिलकुल सामान्य है।
प्यांशु के धैर्य और संकल्प को सुनने की क्षमता का उपहार मिला और फिर उसने वह सब कर दिखाया जो किसी भी बहरे व्यक्ति के लिए असंभव माना जाता है। प्यांशु ने बताया कि वह अब एमएमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है और भविष्य में एक ईएनटी सर्जन बनना चाहता है।