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साहित्यकारों ने सिटी ब्यूटीफुल से की दिल की बातें

Mon, 10 Feb 2014 02:32 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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गीथा हरीहरन, इस्थर डेविड, ज्यूइश राइटर, उर्दू और अंग्रेजी लेखक इमाम मीर जफर, राहुल सिंह और दिल्ली के कवि जितेंद्र, यह सभी साहित्य से जुड़े लोग पहुंचे चंडीगढ़ के यूटी गेस्ट हाउस में।
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चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित फेस्टिवल ऑफ लैर्ट्स के दूसरे दिन की शुरूआत हुई गीथी हरीहरन की कुछ ही दिनों पहले प्रकाशित हुई किताब फ्राम इंडिया टू पेलस्टीन से।

गीथा ने बताया की यह किताब 14 निबंधों में विभाजित है और नान फिक्सन में यह उनका नावेल पेलस्तीन की जिंदगी पर आधारित है।

साहित्य से जुड़ी विचार चर्चा को आगे बढ़ाते हुए गुजरात के इमाम मीर जफर ने अपने काम के बारे में चर्चा शुरू की। बचपन से कविताओं से प्रेम हुआ और चिश्ती परिवार से जुड़े होने के कारण रूमी को जब जाना तो उनको जानने की दिलचस्पी और बढ़ गई।
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इमाम ने बताया की उन्हें मुहब्बत बहुत अच्छी लगती है, जिसकी जरूरत आज हमारे विश्व को भी है। रूमी ने बहुत सी ऐसी बातें कही हैं जिसको अब वैज्ञानिक भी मानते हैं।

इमाम ने अपनी किताब ‘सूफीज्म थ्रू रूमी पोएम’ के कुछ अंश पढ़ के सुनाए, जिनमें भाषा को खूबसूरत और आसान बना कर पेश किया गया था।

दोपहर के बाद गुजरात के अहमदाबाद से लेखक इस्थर डेविड ने साहित्य में अपनी शुरुआत और यहूदी होने के कारण अपनी लेखनी पर उसके प्रभाव को सांझा किया। बचपन से पिताजी के वाइल्ड लाइफ के शौक के कारण इस्थर ने अपना बचपन जानवरों के बीच गुजारा।

आर्किटेक्चर मेें स्नातक  होने के बाद, इस्थर ने स्केच के सहारे आम जिंदगी को कागज में उकेरना शुरू किया। इसी कोशिश मेें उन्हें लिखने से जुडे़ अपने कई किरदार मिलें जिनके ऊपर उन्होंने लिखना शुरू किया।
 
प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह के बेटे राहुल सिंह के साथ रानी बलबीर कौर ने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और खुशवंत सिंह के काम और उनकी जिंदगी के बारे में विचार चर्चा की।

राहुल ने बताया की पिता जी का स्वाभाव बड़ा मजाकिया किस्म का है, राहुल के  50वें जन्मदिन पर जब राजीव गांधी आए तो राहुल ने इससे पहले यह बात परिवार में किसी को नहीं बताई थी, लेकिन जैसे ही राजीव गांधी घर पहुंचे तो खुशवंत सिंह ने उन्हें कहा की आपका हमारे घर में स्वागत है, आपके परिवार से सिर्फ आप थे जो यहां नहीं आए थे, लेकिन अब सोने का टाइम हो गया है तो गुडनाइट। यह कहकर वह साने के लिए चले गए। पापा हर देश को उसके जोक्स पर पहचानते थे।

वह जिस भी देश जाते वहां से यह जरूर पूछते कि यहां का सबसे फेमस जोक कौन सा है। पापा वैसे तो कोई कट्टर नहीं हैं, लेकिन कभी-कभी वह सिख होने पर काफी गौरव महसूस करते हैं।

इसलिए 1984 के दंगों के दौरान अपना पद्म भूषण सम्मान वापस कर दिया। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए इग्नू (दिल्ली) के अध्यापक और कवि जितेंद्र ने अपनी कविताओं से जुड़ा अनुभव सांझा किया और कविताओं में महिलाओं के प्रति अपनी भावना को भी आगे लाए।   
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