थिएटर कलाकार रानी बलबीर कौर ने बताया कि जीएस चन्नी पंजाब यूनिवर्सिटी में उनके सहपाठी थे और अच्छे मित्र भी। शुरुआत के दौर में उन्होंने हयवदन सहित कई नाटक साथ किए। 1972 में थिएटर विभाग के पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा में दाखिले के लिए वह अपनी मां के साथ आए थे। उस दौरान उनकी मां ने कहा था कि एक्टिंग दी इको शर्त है, अपने केश कदि न कटवाईं। चन्नी ने अपनी मां को तब जुबान दी और उसको अंत समय तक निभाया। उन्होंने फिल्म और रंगमंच की दुनिया में बहुत से किरदार निभाए, लेकिन अपनी सादगी और पंजाबीयत को वे साथ लेकर चले। थोड़े समय पहले वे घर आए थे तब मुलाकात हुई थी, वे बच्चों के साथ बच्चे हो जाते थे। मिमिक्री करना, बच्चों को हंसाना.. उन्हें बहुत पसंद था। आज बच्चे भी उन्हें बहुत याद कर रहे हैं। एक जिंदादिल इंसान का यूं चले जाना.. बहुत बड़ा जुल्म हुआ है ये हम पर।
चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के निदेशक भी रहे, कम्युनिटी थिएटर के लिए मिला था अवार्ड
रंगकर्मी जीएस चन्नी ने 1973-74 में कम्युनिटी थिएटर के लिए काम करना शुरू किया। उन्हें इसके लिए संगीत नाटक अकादमी ने अवार्ड से भी नवाजा। उन्होंने चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के निदेशक के रूप में भी लगभग आठ साल काम किया। उन्होंने जालंधर दूरदर्शन के लिए कई नाटक किए। उनके नाटक सामाजिक एकता, प्रेम, औरतों के मुद्दों सामाजिक मुद्दों इत्यादि पर आधारित होते थे। उनके दफा 144, अक्ख दी दहलीज, जिंदगी रिटायर नहीं होती, रॉकेट हो या बंब, पहनो कंडोम इत्यादि नाटक लोगों में काफी पसंद किए गए। टुटू सहित उन्होंने कई टेलीफिल्म्स और दो दर्जन से भी अधिक डॉक्यूमेंट्री बनाई हैं। चन्नी ने टीवी फिल्म निर्माता, अभिनेता, रंगकर्मी, नाटककार, निदेशक इत्यादि कई भूमिकाओं को बखूबी निभाया।