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अत्यधिक तनाव लेने का मतलब इस बीमारी को वेलकम

Tue, 20 May 2014 02:31 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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सफेद दाग (फुलवेरी) के ठोस कारणों का फिलहाल अब तक कुछ भी पता नहीं चल सका। आटोइम्यून सिस्टम की गड़बड़ी के कारण रंग बनाने वाले मेलालीन नामक सेल्स कम होने लगते हैं और चमड़ी का रंग बदलने लगता है। यह प्रक्रिया शरीर में क्यों होती है, इस पर रिसर्च चल रही है।
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सोमवार को डरमेटोलॉजी के विशेषज्ञों ने बताया कि अत्याधिक तनाव भी सफेद दाग का एक कारण बन सकता है। जब सफेद दाग होते हैं तो पेशंट में तनाव की मात्रा भी बढ़ जाती है। उनके सार्वजनिक जीवन में हर तरफ सवाल पूछे जाते हैं। ये कैसे हो गया। कई लोग तो हाथ मिलाने से भी कतराते हैं।

वे समझते हैं कि यह कुष्ठ रोग है। डरमेटोलॉजी के एचओडी संजीव हांडा इस बात को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि यह सब भ्रम है। लोग इसे कुष्ठ रोग समझ लेते हैं। लोग मानने लगते हैं कि यह छुआछूत की बीमारी है, जबकि यह बिल्कुल ऐसा नहीं होता। कुष्ठ रोग और सफेद दाग में जमीन-आसमान का अंतर है। सोमवार को डिपार्टमेंट की ओर से इस बारे में जागरूकता फैलाई गई। कई पोस्टर लगाए गए।
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पीजीआई में इसका शर्तिया इलाज
डा. हांडा ने दावा किया कि सफेद दाग का इलाज पूरे नार्थ इंडिया में पीजीआई में सबसे बेहतर होता है। पीजीआई के प्रमुख प्रोफेसरों की ओर से मरीजों को वर्ल्ड क्लास का इलाज उपलब्ध कराया जाता है। पीजीआई की ओर से अल्ट्रावाइलेंट थैरेपी व लेजर तकनीक से इलाज किया जाता है।

लेजर का क्लीनिक हाल ही में पीजीआई ने शुरू किया है। क्लीनिक का जबरदस्त रिस्पांस देखने को मिल रहा है। दवाइयों से भी इलाज संभव है। जिन जगहों पर बाल नहीं आते उसका इलाज लेजर व थैरेपी से नहीं किया जाता है। वहां पर शरीर के दूसरे हिस्से से चमड़ी लेकर इसका इलाज किया जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि कई बार देखा गया कि पेशंट का सफेद दाग ठीक कर दिया जाता है, लेकिन कुछ हिस्सों में दोबारा से दिखने लगते हैं। डाक्टरों ने माना कि एक बार ठीक होने के बाद इसके दोबारा होने के भी चांस होते हैं। चमड़ी से रंग निकल जाता है।

पिछले साल 673 पेशंट आए थे
सफेद दाग के पेशंट की संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले साल 673 पेशंट रजिस्टर्ड हुए थे। इस हिसाब से एक दिन में दो मरीज आते हैं। करीब 2330 मरीजों का फालोअप किया जा रहा है। इसके अलावा बच्चों में भी ये बीमारी देखी जा रही है। फिलहाल इनकी कितनी संख्या है, इस बारे में बता पाना मुश्किल होगा। असिस्टेंट प्रोफेसर दीपांकर डे के मुताबिक यह किसी भी उम्र में हो सकता है। बच्चों को भी होता है तो सीनियर सिटीजन को भी।

विशेष क्लीनिक बनाया गया
डाक्टरों ने बताया कि ऐसे मरीजों के लिए उन्होंने विशेष क्लीनिक बनाया हुआ है। इसमें शुक्रवार को सुबह आठ से दोपहर 11 तक रजिस्ट्रेशन होता है। इस क्लीनिक में डाक्टरों का एक ग्रुप ही मरीजों को देखता है। इसमें वे मरीजों की काउंसलिंग भी होती है। इस क्लीनिक का मरीजों को बहुत ही लाभ मिल रहा है।
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