पंजाब की चुनावी जंग इस बार अलग रंग में होगी। सूबे की तेरह लोकसभा सीटों में कई पर मुकाबला बाहरी उम्मीदवारों के बीच होगा। दोनों प्रमुख दलों ने कई सीटों पर बाहरी उम्मीदवार उतारे हैं।
पंजाब की सबसे हॉट सीट अमृतसर पर बाहर से आए नवजोत सिद्धू अब स्थानीय हो चले थे। तो भाजपा ने उन्हें हटाकर हैवीवेट लीडर अरुण जेटली को मैदान में उतारा।
वहीं, कांग्रेस ने इसके जवाब में अपने कद्दावर नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को लड़ाने का फैसला कर लिया। दोनों ही नेता बाहर के हैं। आनंदपुर सीट पर अकाली दल ने प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा को उम्मीदवार बनाया। चंदूमाजरा का घर बेशक मोहाली में है, लेकिन उनका सियासी हलका पटियाला ही रहा है। वह संगरूर और फतेहगढ़ साहिब से भी लड़े।
पर आनंदपुर साहिब सीट से यह उनका पहला चुनाव है। कांग्रेस के रवनीत बिट्टू इस बार स्थानीय हो गए थे। उनका टिकट काट कर पार्टी ने अंबिका सोनी को लड़ाने का फैसला किया, जो हलके के लिए बाहरी उम्मीदवार हैं। फतेहगढ़ साहिब से शिअद ने कुलवंत सिंह को टिकट दिया है, जिनका सियासी क्षेत्र मोहाली रहा है।
इसी तरह होशियारपुर से भाजपा ने विजय सांपला को उतारा है। सांपला का निवास और सियासी हलका जालंधर रहा है, होशियारपुर के लिए वह बाहरी हैं। कांग्रेस में इस बार मोहिंदर सिंह केपी को लड़ाने की चर्चा है। वह भी बाहरी होंगे, केपी का हलका जालंधर ही रहा है।
जालंधर से कांग्रेस में शमशेर सिंह दूलो और चौधरी संतोख में किसी को लड़ाने की चर्चा है। दूलो को टिकट मिला तो वह पैराशूट कैंडिडेट होंगे। लुधियाना से आप के एचएस फूलका बाहरी उम्मीदवार हैं। मनीष तिवारी के बजाय विजय इंदर सिंगला को टिकट मिला तो वह भी बाहरी उम्मीदवार होंगे।
नफे-नुकसान
पैराशूट कैंडिडेट्स के फायदे और नुकसान दोनों ही होते हैं। कांग्रेस और शिअद-भाजपा ज्यादातर जगह पैराशूट कैंडिडेट पार्टी की गुटबाजी को देखते हुए उतारे हैं। या फिर योग्य उम्मीदवार को देख कर। बाहरी होने के कारण उनका हलके में विरोध नहीं होता। पार्टी नेता और वर्कर खुलकर चुनाव में उनके साथ चलते हैं।
नुकसान यह है कि बाहरी उम्मीदवारों को स्थानीय सियासत और मुद्दों के बारे में उतनी जानकारी नहीं होती। वोटरों के मन में भी कई बार आशंका रहती है कि पैराशूट कैंडिडेट्स से चुनाव के बाद संपर्क करना ही मुश्किल न हो जाए।