डॉ. नेहा शौरी
डॉ. नेहा शौरी हत्याकांड पहेली बनता जा रहा है। हत्याकांड को जिस तरह अंजाम दिया गया, उससे यह साबित होता है कि इसके पीछे फुलप्रूफ प्लान था। बलविंदर को न सिर्फ डॉ. नेहा शौरी के दफ्तर रूम नंबर 211 तक पहुंचने का हर रास्ता मालूम था, बल्कि वारदात वाले दिन की पूरी जानकारी भी थी। बलविंदर ने हत्याकांड को अंजाम देने के बाद सबसे सुरक्षित रास्ता चुना था। अगर उसकी बाइक खंभे से न टकराती तो मुमकिन है कि वो वहां से भागने में कामयाब हो जाता।
खरड़ की फूड एंड टेस्टिंग लैब की इमारत के दाहिनी ओर सिविल अस्पताल है। बायीं ओर से एक रास्ता सड़क पर आता है। सिविल अस्पताल और बायीं ओर के रास्ते से टेस्टिंग लैब तक पहुंचा जा सकता है। लैब की मेन एंट्रेंस से लेकर इमारत के हर कॉरिडोर में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। 29 मार्च को वारदात वाले दिन लैब की बिल्डिंग में एक कर्मचारी की रिटायरमेंट पार्टी होनी थी। मेन एंट्रेंस से मेहमान दाखिल हो रहे थे, लिहाजा पार्टी के लिए कैटरिंग का सामान बिल्डिंग की पिछली एंट्रेंस से पहुंचाया जा रहा था।
अमूमन ये एंट्रेंस बंद रहती है। वीरवार को भी जब अमर उजाला की टीम बिल्डिंग में गई तो वो एंट्रेंस बंद थी। पता चला कि इस एंट्रेंस को कभी कभार जरूरत पड़ने पर ही खोला जाता है। पुलिस के पास जो सीसीटीवी फुटेज है, उसमें बलविंदर कॉरिडोर में जिस ओर से आता दिख रहा है, वो रास्ता पिछली एंट्रेंस को ही कॉरिडोर से जोड़ता है। लिहाजा साफ है कि बलविंदर को पिछली एंट्रेंस के खुले होने की जानकारी थी और वो बिना किसी रोकटोक के इस रास्ते से इमारत में दाखिल हुआ।
फिर आराम से डॉ. नेहा शौरी के केबिन रूम नंबर 211 तक पहुंचा। वारदात को अंजाम देने के बाद वहां से निकलने के लिए उसने मेन एंट्रेंस और एक्जिट के रास्ते को चुना। बिल्डिंग की पार्किंग में ही उसकी बाइक खड़ी थी, जिस पर उसने वहां से भाग निकलने की कोशिश की। लेकिन बाइक खंभे से टकरा गई और पकड़े जाने के डर से उसने खुद को भी गोलियां मारकर जान दे दी।