चंडीगढ़। मेरे मेडल देखकर यह मत सोचें कि मैं किताबी कीड़ा हूं। मुझे पढ़ाई के साथ अन्य गतिविधियों में भी बेहद रुचि है। मैं बैडमिंटन खेलने का शौकीन हूं। वहीं, क्रिकेट भी मुझे बहुत पसंद है। मेरे तीन गोल्ड मेडल पाने का मूलमंत्र मेरा खुद को ऑलराउंडर बनाने का प्रयास है। सच मानिए खुद को पढ़ाकू बनाने की बजाय ऑलराउंडर बनाइए, फिर मेडल आपके पास खुद चल कर आएगा। यह बातें पीजीआई के पूर्व छात्र डॉ. एस नितेश भारद्वाज ने दीक्षांत समारोह के दौरान तीन गोल्ड मेडल पाने के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान कही।
डॉ. नितेश को बेस्ट स्टूडेंट्स ऑफ इंस्टीट्यूट, बेस्ट स्टूडेंट्स डिपार्टमेंट (पीडियाट्रिक) और हाईएस्ट मार्क्स इन इंस्टीट्यूट के लिए गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। डॉ. नितेश मौजूदा समय में लंदन में पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी में फैलोशिप कर रहे हैं। वहीं उनकी पत्नी रॉकेट साइंस की वैज्ञानिक हैं। डॉ. नितेश का कहना है कि विशेषज्ञता हासिल करने के बाद वह अपने देश में आकर चिकित्सा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने की योजना बना रहे हैं।
पिता के नक्शे कदम पर चल रही बेटी
दीक्षांत समारोह के दौरान गोल्ड मेडल प्राप्त करने वाली एक्सपेरिमेंट मेडिसिन बायोटेक्नोलॉजी की डॉ. शिप्रा बंसल ने कहा कि वह अपने पिता प्रोफेसर अनिल भंसाली से प्रभावित है। अपने पापा को रोल मॉडल मानकर उन्होंने डायबिटीज पर काफी काम किया है। उनकी नजर में मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।
तीन मेडल लेकर बढ़ाया मान
हिमाचल प्रदेश की डॉक्टर अलीशा बब्बर ने दीक्षांत समारोह में तीन अलग अलग वर्गों में दो गोल्ड और एक कांस्य पदक प्राप्त कर अपने परिवार के साथ ही संस्थान और प्रदेश का मान बढ़ाया। डॉ. अलीशा ने बताया कि उनके पिता बिजनेसमैन और मां गृहिणी हैं। वह अपने परिवार की पहली डॉक्टर हैं। उनका उद्देश्य है कि वह चिकित्सा के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल कर इलाज और आसान बनाने में योगदान दें।
इनकी चाह ने आसान की सफलता की राह
प्रायोगिक चिकित्सा और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की डॉ. शीमोना चौधरी ने 2019 के लिए अपनी पीएचडी के लिए कांस्य पदक जीता। उन्होंने लग्न और दृढ़ संकल्प के बल पर पीजीआई के दीक्षांत समारोह में प्रतिष्ठित पदक विजेताओं में शामिल हुईं। डॉ. शिमोना आईसीएमआर आधारित एक प्रोजेक्ट में काम कर रही हैं। डॉ. शिमोना ने कहा, ‘मैं यह समझने की कोशिश कर रही हूं कि क्या एल्ब्यूमिन प्रोटीन गतिविधि के अवरोध का कोलेस्ट्रॉल मॉड्यूलेशन के साथ कोई संबंध है या नहीं।’ पंजाब यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने पहले प्रयास में पीजीआई में पीएचडी की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की। उनका कहना है कि मैंने जो भी योजना बनाई है, कद छोटा होने के बावजूद मुझे उसकी आकांक्षा करने से कभी नहीं रोका है क्योंकि मेरा मानना है कि जहां चाह है वहां राह है।
शारीरिक कमजोरी ने भी नहीं रोका रास्ता
पीजीआई की एमडी पैथोलॉजी डॉ. आकृति बंसल एक प्रगतिशील बीमारी-लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित हैं, जो बाहों और पैरों की मांसपेशियों में कमजोरी का कारण बनती है। लगभग 80 प्रतिशत विकलांगता के साथ खुद को आगे बढ़ा रहीं डॉ. आकृति का मानना है कि उन्होंने जीवन में कभी समझौता नहीं किया। पैथोलॉजी में एमडी में टॉप किया और अपने विभाग में रजत पदक जीता। वीरवार को दीक्षांत समारोह के दौरान उन्हें और उनके पति डॉ. गौरव गर्ग को उसी विभाग और बैच से एमडी की डिग्री प्रदान की। डिस्ट्रोफी के कारण वह सीढ़ियां चढ़ने, अपनेआप उठने या यहां तक कि आसानी से चलने में भी सक्षम नहीं हैं। फिर भी उनके इरादे चट्टान की तरह मजबूत हैं।