थैलेसीमिक बच्चों के मसीहा डा. आरके मरवाहा का निधन शनिवार दोपहर इलाज के दौरान पीजीआई में हुआ। उनकी मौत की खबर सुनकर पीजीआई के स्टाफ मेंबर और उनके साथी सकते में आ गए।
उनकी पहचान एक ऐसे डाक्टर के तौर भी थी कि जो कभी भी ओपीडी के टाइम टेबल से इत्तेफाक नहीं रखते थे। चाहे जितने मरीज हो, वे उन्हें पूरी तसल्ली से देखते थे। सभी मरीजों से वे बहुत सलीके से बात करते थे। खास तौर से थैलेसीमिक बच्चों के लिए उन्होंने जो भी काम किया है, वह अपने आप में एक मिसाल है।
थैलेसीमिक चिल्ड्रेन वेलफेयर को खड़ा करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। थैलेसीमिया के प्रति लोगों का नजरिया तक उन्होंने बदल दिया। करीब 30 साल पहले लोग कहते थे कि थैलेसीमिया बच्चों को खून मत चढ़ाओ, वे ज्यादा दिन तक जी नहीं सकेंगे, लेकिन उन्होंने एक माहौल बनाया कि यदि लोग रक्तदान करें तो इन बच्चों को भी जिंदगी दी जा सकती है।
पीजीआई में कई ऐसे पीड़ित हैं, जिनका जीवन उनके सामने शुरू हुआ और वे उनकी बदौलत एक बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। डाक्टरी पेशे में भी उनका काफी बेहतरीन अनुभव रहा है। साल 1982 में वे पीजीआई के पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के फेकल्टी मेंबर बने। वे एपीसी के हेमेटोलॉजी-आन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर नियुक्त हुए। उन्होंने पुणे के आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कालेज से ग्रेजुएशन किया। एम्स से साल 1978 में एम्स से एमडी की डिग्री हासिल की।
साल 1989 में क्लीनकल फेलोशिप पर लंदन गए। दो महीने तक वे न्यूयार्क स्थित मेमोरियल सलोन कीटरिंग कैंसर सेंटर के क्लीनिक्ल ऑब्जर्वर रहे। अपने पेश के दौरान उन्होंने कई अवार्ड से सम्मानित किया गया। 1986 में उन्हें इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक के एसएस मनचंदा अवार्ड, वीबी राजू इंडोमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। साल 1990 में उन्हें डा. एचबी डिंग्ले मेमोरियल अवार्ड से पुरस्कृत किया गया। साल 1997, 1998 और 1999 में इंडियन अकेडमी आफ पीडियाट्रिक के बेस्ट चेप्टर अवार्ड से नवाजा गया।
बच्चों के कैंसर पर बेहतरीन काम करने पर पंजाब सरकार ने 15 अगस्त 2003 को उन्हें पंजाब सरकार प्रमाण पत्र से पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार के अलावा उन्हें कई फेलोशिप भी मिली थीं। डा. मरवाहा को हाल ही में यूके के चाइल्डहुड कैंसर ल्यूकेमिया ग्रुप के कॉरेसपॉन्डिंग मेंबर के रूप में चुना गया। उनके 350 से अधिक पब्लिकेशंस नेशनल व इंटरनेशनल जरनल में प्रकाशित हो चुके हैं।