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करतारपुर साहिब और श्रद्धालुओं के बीच 1965 के भारत-पाक युद्ध ने बढ़ाईं दूरियां, तोड़ दिया था पुल

Tue, 25 Jun 2019 01:11 PM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमर उजाला, डेरा बाबा नानक(बटाला)
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गुरुद्वारा करतारपुर साहिब, पाकिस्तान - फोटो : फाइल फोटो
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1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध ने श्रद्धालुओं और करतारपुर साहिब के बीच दूरियां बढ़ा दी थीं। उस समय रावी नदी पर बने पुल को तोड़ दिया गया था। 1965 की जंग से पहले डेरा बाबा नानक के आसपास के गांवों के लोग बिना रोक-टोक के गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के दर्शन करके आते थे। उस समय रावी पर लोहे का एक पुल भी बना हुआ था। उस पुल को पार करके ही श्रद्धालु गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने जाते थे।
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1965 की जंग के बाद इस लोहे के पुल को उड़ा दिया गया था। इसी जंग के बाद यहां बीएसएफ की चौकियां स्थापित करके कड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर दी गई थी। उग्रवाद के दौर में पाकिस्तान से आने वाले हथियारों और अन्य विस्फोटक पदार्थों के साथ-साथ आतंकियों और आईएसआई के गठजोड़ को तोड़ने के लिए पंजाब की सीमा पर कंटीले तार लगा दिए गए थे। इससे श्रद्धालुओं और करतारपुर साहिब के बीच दूरियां बढ़ा गईं।

डेरा बाबा नानक में भारतीय सीमा के नजदीक बनाए गए गुरुद्वारा करतारपुर साहिब गेट के नीचे बैठ कर सामान बेच कर रोजी-रोटी कमाने वाले शफी (75) ने बताया कि जब वह 12 साल के थे तो अपने पिता के साथ इस रास्ते से होकर पुल पार करके गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर लौट आते थे। तब इतनी सुरक्षा नहीं होती थी। भारतीय सेना के कुछ जवान तैनात होते थे।

शफी ने बताया कि पहले वह रावी में डुबकी लगाते। फिर दरिया के किनारे होते हुए गुरुद्वारा साहिब पहुंच जाते थे। रास्ते में कोई भी रुकावट नहीं थी। देश विभाजन से पहले डेरा बाबा नानक मुस्लिमों का गांव था। विभाजन के बाद यहां के मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे।

अब गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के दर्शनों के लिए जाना चाहते हैं, इस सवाल के जवाब में शफी ने कहा कि यह बाबा नानक का ही आदेश है कि दोनों देशों की सरकारें कॉरिडोर का निर्माण कर रही हैं। उसके पास पाकिस्तान जाने के लिए पासपोर्ट तो नहीं है, लेकिन जब रास्ते का निर्माण हो जाएगा तो वह यहीं से गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर लेंगे।
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शफी ने कहा, पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि वह देश विभाजन से पहले पैदा हुए लोगों को बिना पासपोर्ट और वीजा के गुरुद्वारा साहिब के दर्शन करने की अनुमति दे। शिंगारा सिंह (72) ने बताया कि देश विभाजन के बाद भी कई वर्ष तक उनके बाप-दादा श्री करतारपुर साहिब दर्शनों के लिए आसानी से सीमा पार चले जाते थे। शिंगारा सिंह को उम्मीद है कि करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण होने के बाद वह एक बार फिर गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर सकेंगे।  

करतारपुर कॉरिडोर से जुड़ेंगे दोनों देश
करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण के लिए गुरुद्वारा साहिब के दर्शनों के लिए इंटरनेशनल बॉर्डर के नजदीक बनाए गए दूरबीन प्लेटफार्म को तोड़े जाने के बावजूद संगत दर्शनों के लिए पहुंच रही है। एक अस्थायी प्लेटफार्म पर लगाई गई दूरबीन से दर्शनों की चाहत से संगत धूप में खड़ी रहती है।

करनाल से अपने परिवार के साथ आई खुशबीर कौर ने कहा कि वह पहली बार यहां आई हैं। उसे बताया गया था कि दूरबीन से पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा साहिबान के दर्शन होते हैं। साथ ही वह करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण को भी देखने आई है। उसे यह जानने की उत्सुकता थी कि कैसे दोनों देशों के सीमाएं इस कॉरिडोर के निर्माण से मिलती हैं।
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