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Chandigarh News: डायलिसिस के मरीजों ने दिया संदेश, बिना ट्रांसप्लांट के भी जी सकते हैं सामान्य जीवन

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चंडीगढ़। किडनी के मरीज यह न सोचें कि ट्रांसप्लांट के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हम सभी उदाहरण हैं कि डायलिसिस पर रहकर भी एक सामान्य जीवन जीया जा सकता है। ये बातें किडनी के उन मरीजों ने कहीं, जो एक दशक से ज्यादा समय से डायलिसिस पर हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं। ये मरीज पीजीआई नेफ्रोलॉजी विभाग की ओर से शनिवार को एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर में आयोजित जनता के साथ पीजीआई का हाथ कार्यक्रम में बतौर अतिथि मौजूद थे। उन्होंने डायलिसिस के साथ जीवन से जुड़ी अन्य अनकही हकीकत को भी जनता के सामने रखा।
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पीजीआई नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. एचएस कोहली ने बताया कि किसी भी डायलिसिस सेंटर की गुणवत्ता जांचनी हो तो बस यह पूछिए कि उनके कितने मरीज पांच वर्षों से वहां डायलिसिस करा रहे हैं। अगर मरीज पांच साल तक डायलिसिस पर है तो उस सेंटर की गुणवत्ता ठीक मानी जाएगी, क्योंकि सबसे ज्यादा मरीज मानक के विपरीत सेंटरों पर डायलिसिस के दौरान होने वाले संक्रमण से मरते हैं।
डॉ. कोहली ने बताया कि जब हम मरीज पर किडनी खराब हाेने का लेबल लगा देते हैं तो उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं, किडनी ट्रांसप्लांट या डायलिसिस। ऐसे में मरीज यह पूछते हैं कि ट्रांसप्लांट की सफलता दर क्या है। उन्हें यह बताया जाता है कि यह इलाज की अंतिम स्थिति नहीं है। दूसरा है डायलिसिस, इसमें अगर मरीज मानकों का पालन करते हुए सही सेंटर में डायलिसिस करवाए तो सफलता दर बढ़ जाती है। अब तो घर में भी लोग डायलिसिस करने लगे हैं। कार्यक्रम में उपस्थित गौरव ने बताया कि वे खुद 1996 से किडनी के मर्ज से ग्रस्त हैं। पहले इलाज कराया, फिर ट्रांसप्लांट कराया, फिर वह फेल हो गया, डायलिसिस पर वर्षों रहा और अब घर पर ही खुद डायलिसिस कर रहा हूं। उन्होंने बताया कि वे खुद डायलिसिस करते हैं। सुबह या शाम को जब उचित समय मिले वो घर पर ही कर लेते हैं। इसे करना भी सीखा, क्योंकि अस्पताल, ऑफिस और घर एक साथ संभालना संभव नहीं हो पा रहा था।
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डायलिसिस के बावजूद जी रहे सामान्य जीवन

मैं पिछले 14 साल से डायलिसिस पर हूं। जब किडनी खराब हुई तब परिवार की जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर थी। बच्चे छोटे थे। ट्रांसप्लांट के लिए जो डोनर मिला, वह रिजेक्ट हो गया। उस स्थिति में मैंने खुद को संभाला, नौकरी के दौरान ऑफिस के साथ पीजीआई में डायलिसिस कराता रहा। परिवार, यहां तक कि बच्चों और पत्नी को भी इसके बारे में पता नहीं चलने दिया। अब बेटी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है तो उसे पता चल गया है। मेरा मानना है कि तनाव पर काबू, डॉक्टर के निर्देशों का पालन और बीमारी का कम से कम प्रचार जीने की राह आसान कर देता है। -डी बजाज, चंडीगढ़

मैं 12 साल से डायलिसिस पर हूं। मेरी नौकरी ट्रेवल से जुड़ी है इसलिए मुझे थोड़ी थकान हो जाती है। पहले भोपाल और फिर पंचकूला आया तो यहां डायलिलिस शुरू कराई। हफ्ते में तीन बार डायलिसिस होता है। क्योंकि मैं पानी ज्यादा पीता हूं। मेरा किडनी के उन मरीजों से यही कहना है कि डायलिसिस पर भी सामान्य जीवन जी सकते हैं। बस जरूरी है मानसिक स्थिति को सकारात्मक बनाने की। इसके लिए अपनी स्थिति को स्वीकार करते हुए खुद को ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रखें। -राजीव सहाय, पंचकूला
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