चंडीगढ़। डायबिटिक फुट के कारण अब शुगर के मरीजों में अल्सर होने और पैर काटने की नौबत नहीं आएगी। पीजीआई के फुट क्लीनिक के विशेषज्ञ और सीएसआईओ के वैज्ञानिक ने मिलकर इससे बचाव की तकनीक तलाश ली है। इस तकनीक की मदद से शुगर के मरीजों के पैरों के थर्मल इमेज से यह पहले ही पता लगाया जा सकेगा कि आने वाले समय में किस स्थान पर घाव बन सकता है। इस तकनीक की मदद से घाव बनने से पहले ही बचाव के उपाय कर लिए जाएंगे जिससे अल्सर या पैर काटने जैसी स्थिति नहीं बनेगी।पीजीआई के इंडोक्राइनोलॉजिस्ट और फुट क्लीनिक प्रभारी प्रो. आशु रस्तोगी ने बताया कि शुगर के मरीजों के पैरों में अल्सर का खतरा बहुत अधिक होता है। स्थिति गंभीर होने पर पैर काटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता इसलिए उस स्थिति से बचाव बेहद जरूरी था। इसके लिए सीएसआईओ के थर्मल विभाग के वैज्ञानिक डॉ. नवीन शर्मा के साथ मिलकर इस पर काम शुरू किया। फुट क्लीनिक में चार साल के प्रोजक्ट के दौरान आए मरीजों के पैरों की 500 तस्वीरें ली गईं और सभी के थर्मल इमेज तैयार किए गए। इन सभी इमेज की फोटो डिक्शनरी बनाकर उन्हें एआई मॉड्यूल में डाला गया और डाटा सेट के आधार पर पैर में होने वाले अल्सर का आकलन पहले ही कर लिया गया। इस शोध को इंटरनेशनल इन्फार्मेशन एंड इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी एसोसिएशन के जरनल में प्रकाशित किया गया है।
पीडो स्कैन लैब ने दिखाया रास्ता
प्रो. आशु ने बताया कि थमर्ल इमेज के माध्यम से पैर के उन बिन्दुओं को चिह्नित किया गया, जहां दबाव होने के कारण गर्मी से घाव बनने का खतरा ज्यादा था। बचाव के लिए पीडो स्कैन लैब में उन मरीजों को चलाकर देखा गया। उस दौरान प्रेशर वाले क्षेत्र को सपोर्ट देने के लिए मरीजों के लिए प्रोफोलैक्टिक डायबिटीक सैंडिल बनवाया गया। इसमें इनसोल के जरिए उन प्रेशर प्वॉइंट को राहत देने का प्रयास किया गया। शोध के दौरान थमर्ल इमेज से उन मरीजों में पैर के अल्सर होने से पहले जानकारी देने के साथ अल्सर होने के बाद उसके इलाज से जुड़ी जानकारी भी सामने आने लगी। इमेज से यह भी पता चलता है कि अगर घाव बना तो इलाज से ठीक होगा या फिर पैर काटने तक की नौबत आएगी। इस स्थिति में डॉक्टर सर्जन की मदद से पहले ही बचाव से जुड़ी इलाज की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।