नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने पीयू में मानद उपाधि प्राप्त करने के बाद बचन का सीक्रेट साझा किया। उन्होंने कहा कि छठी कक्षा के एग्जाम खत्म हुए।
परिणाम आने के बाद अपने दोस्तों को बोला अब छठी की पुरानी किताबें हमारे किस काम की। क्यों न इनको इक्ट्ठा कर उन बच्चों तक पहुंचाया जाए जो इन्हें खरीद नहीं सकते। इसके बाद मुहिम शुरू हुई और देखते ही देखते ढाई हजार किताबें एकत्रित हो गई।
कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि अंदाजा ही नहीं था की यह आइडिया जुनून में बदल जाएगा। मैंने तो सिर्फ अपनी छठी कक्षा की किताबें ही एकत्रित करना शुरू किया था। लेकिन बाद में उनकेपास पहली से लेकर दसवीं कक्षा तक किताबों के दजर्नों सेट इक्ट्ठा हो गए। तभी से किताबों की कद्र का अंदाजा भी हुआ।
अमूमन जहां कुछ बच्चे आसानी से मिलने वाली बुक को बेकद्री से फाड़ देते हैं। जब यही किताब जरूरतमंदों केहाथ में जाती है तो वह इसे जान से बढ़कर संभाल कर रखते हैं। बस उन्हें पढ़ने की आदत डालनी जरूरी है।
छठी में छोटी सी सोच से जो सिलसिला शुरू हुआ था आज उसी का परिणाम सबके सामने है। जिन हाथों में झूठे गिलास, फावड़े और ईंट भट्ठों पर औजार होते थे आज उन्होंने कलम थाम ली है। वह भी इस भीड़ से अलग होकर अपनी जिंदगी की नई कहानी लिखने जा रहे हैं।