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बहुचर्चित स्लम पुनर्वास योजना में घपले की क्लोजर रिपोर्ट मंजूर

Fri, 18 Mar 2016 08:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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सीबीआई - फोटो : DEMO Pics
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यूटी प्रशासन की स्लम पुनर्वास योजना के तहत हाउस अलॉटमेंट के बहुचर्चित घोटाले में सीबीआई की विशेष अदालत ने जांच एजेंसी द्वारा चौथी बार दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट को मंजूर कर लिया है।
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सीबीआई के हाथ घोटाले से संबंधित कोई भी ऐसा सबूत नहीं है जिसके जरिये वह केस को साबित कर सके। जांच एजेंसी इससे पहले 3 बार क्लोजर रिपोर्ट दायर कर चुकी थी, जिसे कोर्ट खारिज कर चुकी है। वहीं इससे पहले सीबीआई ने नगर निगम (एमसी) को स्कीम की अलॉटमेंट रद्द करने की अपील की थी। इस पर एमसी सभी साइट का अलॉटमेंट रद्द कर चुका है। केवल एक साइट में तकनीकी परेशानी के कारण उसमें दिक्कत आ रही है।

मामला मार्च 2009 का है। सीबीआई ने सेक्टर-52 निवासी और पेशे से फाइनेंसर विश्वास कुमार, रीयल एस्टेट एजेंट राम भगत, एमसी क्लर्क मनीमाजरा निवासी हरि सिंह और सेक्टर-52 निवासी ओम प्रकाश के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी समेत भ्रष्टाचार अधिनियम की धाराओं के तहत केस दर्ज किया था। आरोप के मुताबिक, यूटी प्रशासन की हाउस अलाटमेंट में स्लम पुनर्वास योजना के तहत सेक्टर-52 के चार लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उन व्यक्तियों को प्लाट आवंटित किए थे जो इस योजना के दायरे में नहीं आते थे।
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प्लाट आवंटित किए जाने के एवज में बड़ी राशि वसूल जाने का आरोप था। मामला सामने आने के बाद सीबीआई ने जांच की, जिसे कोई ठोस सबूत नहीं मिलने का दावा किया था। वहीं ट्रायल के दौरान एक आरोपी विश्वास कुमार की मौत हो चुकी है, जबकि अन्य 3 के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो सके। वहीं उन पर आरोप था कि उन्होंने सेक्टर-52 में स्लम पुनर्वास योजना में 20 फ्लैट जाली तरीके से बेचने के लिए जाली दस्तावेज तैयार किए थे। सीबीआई सूत्रों के अनुसार मामले में कुल 20 फ्लैट में से एक का कोई केस चल रहा है, जबकि 19 में से 7 में वास्तविक अलॉटी रह रहे हैं।

3 बार हो चुकी थी रिपोर्ट खारिज
जांच एजेंसी ने सबसे पहले मार्च 2010 में केस में क्लोजर रिपोर्ट दायर की थी। इसमें सीबीआई की ओर से कहा गया था कि केस में कोई भी सबूत नहीं मिले हैं, जिससे आरोप साबित हो सके। इसे अदालत ने सितंबर 2010 में खारिज कर दिया था। इसके बाद दूसरी क्लोजर रिपोर्ट वर्ष 2013 और उसके बाद तीसरी रिपोर्ट जनवरी 2015 में दायर की गई थी जिसे फरवरी में सीबीआई की विशेष अदालत ने खारिज कर दिया था।

साथ ही जांच एजेंसी को नए सिरे से जांच के आदेश दिए थे। तीसरी क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते हुए तत्कालीन सीबीआई जज ने कहा था कि ट्रांजिट साइट्स अलॉटीज बिना कंपीटेंट अथारिटी की मंजूरी के पॉवर ऑफ अटार्नी के आधार पर साइट आगे नहीं बेच सकते थे। 6 ट्रांजिट साइट्स अलॉटीज गैरकानूनी तरीके से कब्जाई गई थी। इन्हें कब्जाने वाले लोगों समेत वह सरकारी कर्मी व अन्य जिन्हें इन गैरकानूनी कब्जाने वालों के खिलाफ कानूनी कदम उठाना चाहिए था, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए थी।
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