इसमें छोटे सा चीरा लगाकर टिश्यू को निकाल दिया जाता है। इससे दूर की चीजें भी साफ दिखने लगती हैं और चश्मा हट जाता है। बताया जा रहा है कि यह मशीन इंस्टाल करने वाला पीजीआई देश का पहला पब्लिक हॉस्पिटल होगा। इस तरह की मशीनें देश के किसी भी पब्लिक हॉस्पिटल में नहीं है। इसका लाभ न सिर्फ चंडीगढ़ बल्कि पूरे क्षेत्र को मिलेगा।
मायोपिया के क्या कारण हैं?
वैसे तो आमतौर पर माना जाता है कि मायोपिया आंखों की बनावट पर निर्भर करता है। मगर पिछले साल में हुई रिसर्च बताती हैं कि बच्चों में आउटडोर एक्टिविटीज की कमी होने की वजह से बच्चे मायोपिया का शिकार हो जाते हैं। जानकारों के अनुसार, इसकी एक वजह नैचुरल लाइट में कम रहना भी है। ऐसा माना गया है कि जो बच्चे बाहर खेलने-कूदने में समय बिताते हैं, उनके इस बीमारी की चपेट में आने के कम चांसेज होते हैं।
जानकार बताते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक, साल 2050 तक करीब पांच अरब लोग यानी विश्व की आधी आबादी इस बीमारी से ग्रसित हो सकती है, जिसमें से 10 फीसदी लोगों में स्थायी अंधेपन के खतरे देखे गए हैं।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इसके तेजी से बढ़ने का एक कारण पर्यावरणीय होने के साथ ही मुख्य रूप से गलत जीवनशैली है। ऐसे भी आजकल बड़ों से लेकर बच्चे तक मोबाइल, लैपटॉप आदि पर रोजाना छह से आठ घंटे बिताते हैं, जिसकी वजह से बहुत कम उम्र से ही बच्चों में इस बीमारी के लक्षण देखने के मिल रहे हैं।
स्माइल काफी एडवांस तकनीक से लैस है। इससे मायोपिया को ठीक किया जा सकेगा। साथ ही दूसरी जटिल समस्याओं में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। -प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई चंडीगढ़