फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बच्चों की आंखों से चश्मा मिनटों में होगा दूर, पीजीआई चंडीगढ़ में लग रही देश की पहली 'स्माइल मशीन'

Sun, 25 Aug 2019 04:25 PM IST
ajay kumar आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
विज्ञापन

अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश लोगों की पास की नजर तो ठीक रहती है, मगर दूर की नजर में गड़बड़ी होती है। दूर की वस्तुओं को देखने में धुंधलापन नजर आता है। मेडिकल की भाषा में इसे रिफ्रेक्टिव एरर या मायोपिया कहते हैं। इस बीमारी की वजह से बचपन से ही बच्चों की आंखों पर चश्मा लग जाता है। 

विज्ञापन


आजकल अधिकतर बच्चे इससे पीड़ित होते हैं। हालांकि, इसका इलाज उपलब्ध है, लेकिन इलाज के दौरान जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। मगर अब एडवांस तकनीक से इसका पुख्ता इलाज संभव है।

पीजीआई में स्माल इंसिशन लेंटिक्यूल इक्स्ट्रेक्शन (स्माइल) नामक मशीन आई है, जिसकी मदद से बहुत कम चीरा लगाकर रिफ्रेक्टिव एरर (आंखों के दोष) को दूर किया जा सकता है। इस मशीन को एडवांस आई सेंटर में लगाने का काम चल रहा है। जर्मनी बेस्ड इस मशीन को अगले 15 दिन के भीतर इंस्टाल कर दिया जाएगा।
विज्ञापन


मायोपिया की दिक्कत बचपन में ही शुरू होती है। आंखों में एरर आ जाता है और इस वजह से पास की चीजें तो साफ दिखती हैं, मगर दूर की चीजों को देखने में दिक्कतें आती हैं। मौजूदा वक्त में इसे हटाने के लिए बड़ा चीरा लगाकर आंखों में आए एरर को दूर कर दिया जाता है। हालांकि, इसमें कई सारी जटिलताएं रहती हैं। अब इसकी एडवांस तकनीक आ गई, जिसमें जटिलताओं को लगभग खत्म सा कर दिया गया है।

विज्ञापन

इसमें छोटे सा चीरा लगाकर टिश्यू को निकाल दिया जाता है। इससे दूर की चीजें भी साफ दिखने लगती हैं और चश्मा हट जाता है। बताया जा रहा है कि यह मशीन इंस्टाल करने वाला पीजीआई देश का पहला पब्लिक हॉस्पिटल होगा। इस तरह की मशीनें देश के किसी भी पब्लिक हॉस्पिटल में नहीं है। इसका लाभ न सिर्फ चंडीगढ़ बल्कि पूरे क्षेत्र को मिलेगा।

मायोपिया के क्या कारण हैं?
वैसे तो आमतौर पर माना जाता है कि मायोपिया आंखों की बनावट पर निर्भर करता है। मगर पिछले साल में हुई रिसर्च बताती हैं कि बच्चों में आउटडोर एक्टिविटीज की कमी होने की वजह से बच्चे मायोपिया का शिकार हो जाते हैं। जानकारों के अनुसार, इसकी एक वजह नैचुरल लाइट में कम रहना भी है। ऐसा माना गया है कि जो बच्चे बाहर खेलने-कूदने में समय बिताते हैं, उनके इस बीमारी की चपेट में आने के कम चांसेज होते हैं। 

जानकार बताते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक, साल 2050 तक करीब पांच अरब लोग यानी विश्व की आधी आबादी इस बीमारी से ग्रसित हो सकती है, जिसमें से 10 फीसदी लोगों में स्थायी अंधेपन के खतरे देखे गए हैं।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इसके तेजी से बढ़ने का एक कारण पर्यावरणीय होने के साथ ही मुख्य रूप से गलत जीवनशैली है। ऐसे भी आजकल बड़ों से लेकर बच्चे तक मोबाइल, लैपटॉप आदि पर रोजाना छह से आठ घंटे बिताते हैं, जिसकी वजह से बहुत कम उम्र से ही बच्चों में इस बीमारी के लक्षण देखने के मिल रहे हैं।

स्माइल काफी एडवांस तकनीक से लैस है। इससे मायोपिया को ठीक किया जा सकेगा। साथ ही दूसरी जटिल समस्याओं में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।  -प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई चंडीगढ़ 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें