कब कौन कहां किस तरह आपकी जिंदगी में आ जाए... यह कोई नहीं जानता। ऐसा ही मेरे साथ हुआ। मेरे पति बिमल शादी से पहले किराए के लिए कमरा ढूंढ रहे थे और पापा एक किराएदार। गली में एक दुकान पर हमने किराएदार के लिए बोल रखा था। वहीं, मेरे पति भी सामान लेने आते थे। जब उन्हें हमारे यहां किराए पर कमरे का पता चला तो वे मिलने आए और पापा ने उन्हें कमरा किराए पर दे दिया। उन दिनों 1994 में मैं बीएड कर रही थी और मेरे पति नौकरी। वे किराएदार थे तो कभी किराया देने, बिल देने, किसी न किसी बहाने से पापा से मिलने आते थे। दरवाजा खोलने पर मुझ से बस इतना पूछते थे... अंकल है? मैं भी उतना ही जवाब देती थी। इन छोटी-छोटी बातों और मुलाकातों में कब हम एक-दूसरे को पसंद करने लगे पता नहीं चला। उस समय उनकी नौकरी बहुत बढ़िया तो नहीं थी, फिर भी हमने शादी का फैसला लिया। ढाई साल के प्यार के बाद 1997 में माता पिता व परिवार वालों के आशीर्वाद से शादीशुदा जिंदगी शुरू की। शादी के 28 सालों में जिंदगी के बहुत से उतार चढ़ाव देखे, पर एक दूसरे का साथ दिया। दो बेटियों के माता-पिता बनने का सौभाग्य भी मिला। मैंने नौकरी के साथ घर संभाला, बच्चों की परवरिश अकेले की तो मेरे पति ने घर से दूर रह नौकरी कर घर और परिवार को वित्तीय सहायता और सुरक्षा प्रदान की। वे एक मजबूत ढाल बन परिवार के लिए हमेशा खड़े रहे। हमने बच्चों को पाल पोस, पढ़ा लिखा अपने पैरों पर खड़ा किया, पैसों की तंगी व स्वस्थ संबंधी समस्याएं भी देखीं, सब कुछ साथ मिलकर संभाला।
ये है असली वेलेंटाइन
प्यार सिर्फ गिफ्ट देना, पैसे खर्चना, रोमांस करना या घूमना फिरना ही नहीं है, ये हर परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ देने का वादा है। एक दूसरे के साथ ढाल बन खड़े होना, विपरीत परिस्थितियों से जूझना और एक-दूसरे के साथ मुश्किल और जटिल परिस्थितियों में भी साथ बने रहना ही असली प्यार है और असली वेंलेंटाइन भी।
-अभिलाषा गुप्ता
अनदेखा रिश्ता से बना अटूट प्यार, जारी है 35 साल का सफर
आज के दौर में जहां प्यार मुलाकातों और लंबी बातचीत पर टिका होता है, वहीं 35 साल पहले एक ऐसी प्रेम कहानी जो अनोखी भी थी और दिल छू लेने वाली भी। यह कहानी है एक अरेंज मैरिज की, जिसमें लड़का-लड़की का रिश्ता तो तय हो गया, लेकिन चार साल तक उन्होंने एक-दूसरे को देखा तक नहीं। न तस्वीरों का आदान-प्रदान हुआ, न कोई बातचीत का। बस परिवारों का विश्वास और तकदीर का फैसला।
फिर आया वह खास दिन 10 फरवरी (वेलेंटाइन वीक) शादी का दिन। पहली बार जब मंडप में हमारी नजरें मिलीं तो कोई अनजानपन नहीं था, कोई झिझक नहीं थी। बस एक अजीब-सा अपनापन था, एक भरोसा था और एक नजर में कही गई वो अनकही बातें जो जीवनभर निभाने का वादा कर रही थीं। समय बीतता गया और हमारा रिश्ता हर गुजरते दिन के साथ और गहराता गया। न बड़े-बड़े इजहार की जरूरत पड़ी, न दिखावे की। हमने एक-दूसरे को बिना देखे अपनाया था, और आज 35 साल बाद भी वही अपनापन बरकरार है।
दिल से देखा और महसूस किया जाता है असली प्यार
प्यार सिर्फ आंखों से नहीं, दिल से देखा और महसूस किया जाता है। असली प्रेम वह है, जो परिस्थितियों से परे होकर भी टिकता है, बढ़ता है और जीवनभर निभता है।
-कांता देवी और लक्ष्मी दत्त, सेक्टर-27