मोबाइल केवल आंख और नींद को ही कमजोर नहीं कर रहा बल्कि इससे निकलने वाली नीली रोशनी दिमाग की नसों को भी अपना शिकार बना रही है। रात में मोबाइल पर घंटों बिताने के कारण युवाओं में नींद न आने की परेशानी बढ़ रही है। इससे तनाव के साथ शारीरिक और मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है।
गंभीर बीमारियां बढ़ने से दिमाग को खून की आपूर्ति करने वाली धमनियां में ब्लॉकेज हो रही है। दिमाग तक खून का प्रवाह बाधित होने से ब्रेन स्ट्रोक और ऐसी अन्य स्थिति उत्पन्न हो रही है। पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो. धीरज खुराना ने न्यूरोसोनोलॉजी के सातवें वार्षिक सम्मेलन में यह बात कही।
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प्रो. खुराना ने बताया कि पीजीआई के स्ट्रोक क्लीनिक में आने वाले ज्यादातर मामलों में यही केस हिस्ट्री है। इसलिए लोगों को सिर्फ आंख और नींद ही नहीं दिमाग बचाने के लिए भी मोबाइल का कम से कम उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। उनका कहना है कि मोबाइल के ज्यादा उपयोग से होने वाली एक शारीरिक समस्या धीरे-धीरे अन्य अंगों को भी चपेट में लेती जाती है। इसलिए यह सोचना कि इससे सिर्फ आंख कमजोर होगी बिल्कुल गलत है। मोबाइल एक ऐसा हथियार है जो एक वार में कई शिकार कर रहा है।
रात ही नहीं दिन में भी ज्यादा उपयोग घातक
प्रो. धीरज ने बताया कि युवाओं में मोबाइल का क्रेज जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, वह बेहद घातक है क्योंकि वे दिमाग की धमनियों पर दबाव बढ़ा रहा है। मोबाइल का ज्यादा उपयोग सिर्फ रात में ही नहीं दिन में भी बेहद खतरनाक है। मोबाइल के कारण लोगों की शारीरिक क्रियाशीलता कम हो रही है। इससे मोटापा, शुगर और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। फैट और अन्य हानिकारक तत्व शरीर में एकत्र होकर खून की धमनियों में ब्लॉकेज कर रहे हैं जिससे रक्त संचार प्रभावित हो रहा है। इस स्थिति के कारण ब्रेन स्ट्रोक और ऐसी अन्य घातक बीमारियां युवाओं को शिकार बना रही हैं। इन सबसे से बचने के लिए जरूरी है कि मोबाइल का कम से कम उपयोग किया जाए और खुद को ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रखा जाए।
नींद को ऐसे निगल रही नीली रोशनी
प्रो. धीरज ने बताया कि आंखें नीली रोशनी को रोकने में अच्छी नहीं हैं। इसलिए इसका सारा हिस्सा सीधे रेटिना के पीछे से गुजरता है जो मस्तिष्क को प्रकाश को छवियों में अनुवाद करने में मदद करता है। प्रकाश के सभी रंगों के संपर्क में आने से प्राकृतिक नींद और जागने के चक्र या सर्कैडियन लय को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। किसी भी अन्य रंग की तुलना में नीली रोशनी शरीर की नींद के लिए तैयार होने की क्षमता के साथ खिलवाड़ करती है क्योंकि यह मेलाटोनिन नामक हार्मोन को अवरुद्ध करती है जो नींद देती है।
सोने से पहले इन्हें देखना बन रहा घातक
- टेलीविजन
- स्मार्टफोन
- गेमिंग सिस्टम
- फ्लोरोसेंट प्रकाश बल्ब
- एलईडी बल्ब
- कंप्यूटर मॉनिटर
दिमाग को करना है मजबूत तो ये करें
- स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर स्क्रीन पर नीली रोशनी-फिल्टरिंग एप्स इंस्टॉल करें।
- लाल रंग सर्कैडियन लय को सबसे कम प्रभावित करता है। इसलिए लाल रोशनी वाले नाइट ब्लब का उपयोग करें।
- सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप और टीवी बंद कर दें।
- स्क्रीन समय को सोने से दो-तीन घंटे पहले कम करना शुरू करें।