पराली जलाने के दौरान यानी दोपहर एक से शाम छह बजे तक यह हिस्सेदारी कई बार 90% से भी अधिक पहुंच गई। ब्लैक कार्बन के अन्य स्रोतों में पावर प्लांटों की हिस्सेदारी 24 फीसदी, वाहनों की 20.2 फीसदी, उद्योगों की 6.1 फीसदी और कचरा जलाने की दो फीसदी रही। स्टडी में हवा की गति और दिशा भी मापी गई।
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पंजाब में पराली जलाने से हवा में हानिकारक ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ा रही है। इसका असर सेहत पर पड़ रहा है। पीयू, पीजीआई और आईआईटी दिल्ली की स्टडी में सामने आया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की हवा में मौजूद ब्लैक कार्बन का 48% हिस्सा फसल अवशेष जलाने से निकलता है।
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खरीफ सीजन में खेतों के आसपास जांच की गई। इसमें कुल ब्लैक कार्बन में आधी हिस्सेदारी पराली के धुएं की मिली। पता चला कि पंजाब में पराली का प्रदूषण दिल्ली-एनसीआर के साथ हरियाणा, यूपी और आसपास के राज्यों को भी प्रभावित कर रहा है।
ब्लैक कार्बन क्या है, कितना खतरनाक
कृषि अवशेष जलने से निकलने वाले बारीक काले कण ब्लैक कार्बन कहलाते हैं। यह पीएम 2.5 का प्रमुख हिस्सा है और हवा में तैरता रहता है। हालांकि, इसका जीवनकाल 4 से 7 दिन होता है। इसलिए इसके उत्सर्जन में कमी से हवा की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है।
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स्टडी में ये सिफारिशें
रिपोर्ट में किसानों को पराली प्रबंधन की मशीनें समय पर और कम खर्च में उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है। पराली से बिजली, बायोफ्यूल और बायोमास पेलेट जैसे उत्पाद बनाने को बढ़ावा देने की बात कही है। साथ ही वाहनों, पावर प्लांट और उद्योगों से होने वाले ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन में कमी लाने की सिफारिश की गई है। स्टडी में पीजीआई-पीयू टीम के साथ डॉ. मयंक कुमार और आईआईटी दिल्ली के विकास गोयल व अजीत कुमार शामिल थे।
फसल अवशेष जलाने से पंजाब के ग्रामीण इलाकों में ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ रही है। असर पंजाब तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की हवा पर पड़ रहा है। इससे अस्थमा, दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। पराली जलाने पर रोक के साथ वाहनों और फैक्ट्रियों से होने वाले प्रदूषण को कम करना होगा।