27 मार्च को पूरे विश्व में विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है। पिछले साल कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन से रंगकर्मी हताश है। उनका आरोप है कि सरकार का ढीला रवैया रंगमंच के खत्म करने में लगा है। पिछले एक साल से लॉकडाउन के कारण रंगमंच बंद हैं। ऐसे में कलाकारों को सरकार और प्रशासन दोनों तरफ से किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली है।
चंडीगढ़ के रंगकर्मियों ने बताया कि नए साल में ही रंगमंच को अनुमति मिली थी। इससे कलाकारों में थोड़ी उम्मीद जगी थी। वहीं अब दोबारा केस बढ़ने से फिर से निराशाजनक माहौल पैदा कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ सरकार के पास रंगमंच विधा को फिर से कैसे पटरी पर लाना है, कलाकारों की आर्थिक सहायता इत्यादि के लिए कोई नीति या योजना नहीं है।
लॉकडाउन के कारण बहुत से कलाकारों को रंगमंच छोड़कर कॉल सेंटर और होटल इत्यादि में नौकरी करनी पड़ रही है। रंगमंच कला के जरिए कलाकार लोगों के मुद्दों और उनकी समस्याओं को उठाता है, उनकी आवाज बनता है, लेकिन आज रंगमंच को खुद के अस्तित्व के लिए आवाज उठानी पड़ रही है। क्योंकि रंगमंच व्यवसाय नहीं है, आम जनता को मुफ्त में नाटक दिखाया जाता है, यह प्रशासन और सरकार की सहायता से ही आगे बढ़ सकता है।
क्या कहते हैं रंगकर्मी
रंगमंच व्यवसाय नहीं
रंगमंच व्यवसाय नहीं है, यह सरकार की सहायता से ही आगे बढ़ सकता हैं। बहुत-से कलाकार अपना सारा समय रंगमंच को देते हैं, ऐसे में उन्हें आर्थिक सहायता की ज्यादा जरूरत होती है। अगर चंडीगढ़ की बात करें तो यहां हर रंगमंच ग्रुप मुफ्त में लोगों के लिए नाटक तैयार करते हैं। नाटक को तैयार करने में भी खर्च आता है। जब नाटक ही बंद हो जाएंगे तो रंगमंच और रंगकर्मी दोनों कैसे जिंदा रह पाएंगे, यह चिंता का विषय है। - मुकेश, संवाद थिएटर
मौजूदा हालातों ने फिर फैलाई निराशा
सरकार से कभी रंगमंच को कोई सहायता नहीं मिली है। इस वर्ष के शुरू होने पर जब थिएटर खुले तो उम्मीद जगी थी कि अब धीरे-धीरे हालात सामान्य हो जाएंगे और रंगमंच को भी हम पहले की तरह सामान्य कर लेंगे। वहीं अब दोबारा थिएटर बंद करने की बात ने कलाकारों में निराशा फैला दी है। हमारे ग्रुप के कई कलाकारों को लॉकडाउन में रंगमंच छोड़कर होटल, कॉल सेंटर इत्यादि में नौकरी करनी पड़ रही है। कुछ पैतृक घर लौट गए हैं। -रंजीत रॉय, चंडीगढ़ आर्ट थिएटर
रंगकर्मियों को अपने लिए आवाज उठाने की जरूरत
रंगकर्मी हमेशा समाज को एक सकारात्मक दिशा देने का प्रयास करते हैं। लोगों की समस्याओं को कला के जरिए उजागर करते हैं, लेकिन आज रंगकर्मियों को अपने लिए आवाज उठाने की जरूरत है। जो लोग रंगमंच पर पूरी तरह निर्भर थे, लॉकडाउन ने उनकी जिंदगी को बहुत प्रभावित किया है। सरकारें भी कलाकारों को भूली बैठी हैं। संस्कृति मंत्रालय और प्रशासन कहीं से भी रंगमंच को कोई आर्थिक मदद नहीं की जाती है। महामारी के समय कम से कम कलाकारों के सहयोग लिए कोई नीति बनाई जाए, जिससे नए आने वाले कलाकारों को प्रोत्साहन मिले।