चंडीगढ़। रूमेटोलॉजिकल रोगों को लेकर लोगों के मन में बैठे गलत अवधारणा को दूर करने के लिए भारतीय रूमेटोलॉजी एसोसिएशन ने अप्रैल को जागरूकता माह के रूप में घोषित किया है। यह जानकारी एसोसिएशन के सचिव व पीजीआई के प्रो. अमन शर्मा ने दी। उन्होंने बताया कि अगर समय रूमेटोलॉजिकल रोगों की पहचान कर उचित इलाज शुरू कर दिया जाए तो अपंगता और अंगों के विफल होने जैसी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लोग अब भी इसे एक उम्र के बाद होने वाली बीमारी मानकर इलाज कराने से कतराते हैं जो जीवन को बेहद कठिन और दर्द से पूर्ण बना देता है। प्रो. अमन ने बताया कि भारत में इन रोगों से पीड़ित मरीजों की संख्या कुल आबादी की 2.5 प्रतिशत है। मरीजों की संख्या को देखते हुए प्रत्येक जिले में कम से कम इसके इलाज के दो से तीन विशेष विभाग होने आवश्यक है। रूमेटोलॉजिकल रोगों में खासतौर पर गठिया, ल्यूपस, स्पोंडिलइटिस और कई अन्य गंभीर बीमारियां शामिल हैं। कई रूमेटोलॉजिकल रोग जीवन के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। उनकी वजह से फेफड़ा, हृदय और गुर्दा जैसे अंग प्रभावित हो सकते हैं। यह रोग युवा और 40 साल से कम उम्र की आबादी को भी तेजी से प्रभावित करने लगा है। यह बीमारियां ज्यादातर ऑटो इम्यून से जुड़ी होती हैं जो हमारी अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर शरीर के अंगों पर हमला करती हैं। इसलिए इसका समय पर इलाज बहुत ही जरूरी है। प्रो. अमन ने बताया कि ऐसे रोगों से पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा प्रभावित हैं। इसलिए किसी भी तरह का लक्षण सामने आने पर उसे दबाने की बजाय विशेषज्ञ के पास जाकर इलाज कराएं क्योंकि विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत भी इन बीमारियों का इलाज किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रूमेटोलॉजिकल रोगों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए नीति संशोधन को लेकर एसोसिएशन अप्रैल माह में कई शिक्षाप्रद कार्यक्रम आयोजित करेगा।