शाम छह बजे रिवांश पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर में पहुंच गया और उसे इमरजेंसी में दाखिल भी कर लिया गया। आरोप के मुताबिक, वहां मौजूद डॉक्टर प्रियंका ने परिजनों से ब्रोंकोस्कोपी करने की इजाजत मांगी। साथ ही कहा कि इस प्रक्रिया में बच्चे की मौत भी हो सकती है। जल्दी बताइए क्या करना है। इतना सुनते ही परिजन घबरा गए।
उन्होंने कहा कि पांच मिनट का वक्त दीजिए, आपको बताते हैं। यह बात सुनते ही डॉक्टर ने कहा कि उनके पास समय नहीं है और कार्ड में लिख दिया कि परिजनों ने ब्रोंकोस्कोपी करने से मना कर दिया है। करीब एक घंटे बाद परिजन डॉक्टर के पास पहुंचे और कहा कि वे ऑपरेशन की प्रक्रिया के लिए तैयार हैं। उसके बाद उन्हें दवा की लिस्ट दी गई और ब्लड सैंपल ले लिए गए।
आरोप है कि उसके बाद भी डॉक्टर इलाज के लिए तैयार नहीं हुए। उसी दौरान एक और डॉक्टर पहुंची और कहा कि तुम्हारे लिए सर्जन फ्री नहीं है। एक बार तुमने मना कर दिया तो अब इंतजार करो। बच्चा मर गया तो हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। परिजनों का कहना है कि वे पूरी रात डॉक्टरों के सामने मिन्नते करते रहे, लेकिन वे इलाज को तैयार नहीं हुए।
सुबह करीब तीन बजे बच्चे का रंग नीला पड़ने लगा। बुखार भी काफी तेज हो गया। करीब छह बजे बच्चे ने सांस लेना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने बच्चे को सीपीआर देने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
परिजनों का आरोप है कि यदि बच्चे को समय पर इलाज मिल जाता तो बच्चे की जान नहीं जाती। पोस्टमार्टम में बच्चे की मौत का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया गया है। उन्होंने लापरवाह डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की अपील की है।
आरोप पर क्या कहना है पीजीआई का
पीजीआई के पीडियाट्रिक सर्जरी के एचओडी प्रोफेसर राम समुझ ने बताया कि हमारे पास इस बात का रिकार्ड है, जिसमें अभिभावकों ने ब्रोंकोस्कोपी करने से मना किया था। हमारी ओटी तो सुबह चार बजे तक चलती रही। यदि वे अनुमति देते तो हम बच्चे का ऑपरेशन जरूर करते। हमने उस दिन भी दो केस किए, जिसमें बच्चों ने फारेन बाडी गटक ली थी।
बच्चे का इलाज नहीं करने का कोई सवाल नहीं बनता। दरअसल, बच्चा देर रात तक पूरी तरह से ठीक था। परिजनों को भी लगा कि बच्चा ठीक है, इसलिए उन्होंने अनुमति नहीं दी। उनके पास प्राइवेट हॉस्पिटल का एक सीटी स्कैन भी था, जिसमें लिखा था कि बच्चे के अंदर कोई फारेन बाडी (बादाम) नहीं है, इसलिए वह निश्चिंत थे। हमने कई बार पूछा, लेकिन वे तैयार नहीं हुए।
बच्चे के मामा विशाल अग्रवाल ने बताया कि 30 अप्रैल को बच्चा एक साल होने वाला था। उसके जन्मदिन को धूमधाम से मनाने की तैयारियां चल रही थीं। घर का पहला बच्चा था और सभी का लाडला था। रिवांश की मौत से पूरा परिवार सदमे में है। उन्हें यह बात सालती जा रही है कि यदि बच्चे को समय पर इलाज मिल जाता तो उसकी जान जरूर बचती।
उनका कहना है कि यदि डॉक्टर उनसे सही से बात करती तो शायद तुरंत ही अनुमति दे देते, लेकिन जब डॉक्टर ने सीधे बोल दिया कि बच्चे की मौत भी हो सकती है। इससे परिजन घबरा गए। मगर उसके बाद काफी मिन्नतें कीं, लेकिन डॉक्टर तैयार ही नहीं हुए। और पूरी रात डॉक्टर काफी बदतमीजी से बात करते रहे।
तीन साल तक के बच्चे को गले में फंसने वाली चीजों से दूर रखें
छोटे बच्चों में हर छोटी चीज मुंह में डालने की उत्सुकता रहती है। इस चक्कर में वे कोई भी चीज मुंह में डाल लेते हैं। बच्चे मूंगफली के दाने, सेप्टिक पिन, राजमा, मटर का दाना, सिक्का, बटन बैटरी, बादाम और छोटी बॉल सहित अन्य चीजें मुंह में डाल देते हैं।
कुछ बच्चे तो आधे घंटे में ही गंभीर हो जाते हैं तो कुछ बच्चे पांच दिन बाद भी ठीक रहते हैं। ये सब कुछ बच्चे और गटकने वाली चीजों पर निर्भर करता है। इसका एक मात्र उपाय यही है कि तीन साल के बच्चों को गले में फंसने वाली चीजों से दूर रखा जाए।
क्या करना चाहिए प्राथमिक उपचार
विशेषज्ञों ने बताया कि यदि बच्चा कोई चीज गटक ले तो उसे पूरा उल्टा कर दें और उसके पीठ थपथपाएं। इससे कई बार गटकी चीजें बाहर निकल आती हैं और कोशिश कीजिए की जल्द से जल्दी बड़े अस्पताल पहुंचें। बड़े अस्पताल इसलिए क्योंकि छोटे अस्पतालों में इस तरह की सुविधा नहीं होती और अस्पतालों के चक्कर काटने पर समय काफी बर्बाद होता है।
बच्चे को लिटाकर कुछ न खिलाएं
पिछले दिनों लखनऊ में भी एक ऐसा केस आया था, जिसमें एक मां नौ महीने की बच्ची को लिटाकर चम्मच से दूध पिला रही थी। दो तीन चम्मच दूध पीते ही उसे हिचकी आने लगी और साथ में सांस उखड़ने लगी। परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। ऐसे में दो साल से कम उम्र के बच्चे को कभी लिटाकर न खिलाएं। बच्चे को पानी, दूध व खाद्य पदार्थ बैठाकर खिलाएं।