शहर के लिए इस बार यश, वैभव, पराक्रम, विद्या और सुख साधन लेकर आएगा अक्षय तृतीया। यह कहना है सिद्धांत ज्योतिषाचार्य और सेक्टर-45 के सूर्य कुंड शिव मंदिर के प्रमुख पुजारी रवींद्र कुमार मिश्र का।
उनका कहना है कि अक्षय तृतीया दो मई दिन शुक्रवार को है। दो मई को सूर्योदय सुबह 5 बजकर 42 मिनट पर है। यह वृष राशि में मेष लग्न में और राहिणी नक्षत्र में है। वृष का स्वामी शुक्र, मेष का मंगल और रोहिणी का स्वामी चंद्रमा है। शुक्र, चंद्रमा और सूर्य उच्च का होने के कारण हर तरह से शुभ ही शुभ सिटी ब्युटीफुल के लिए होगा।
27 साल के बाद संयोग
इस बार वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया और चतुर्थी, शुक्रवार और रोहिणी नक्षत्र है। यह संयोग 27 वर्षों के बाद आया है। इसके कारण दुष्टों का पराक्रम घटेगा। इस वर्ष अक्षय तृतीया दो मई को दोपहर 12 बजकर तीन मिनट तक रोहिणी नक्षत्र से युक्त है।
वैशाख की अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी न हो तो पृथ्वी पर दुष्टों का बल पराक्रम बढ़ता है। परंतु इस वर्ष तृतीया रोहिणी का संयोग उत्तम फलकारी है। इस तिथि को ईख रस से बने पदार्थ दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूजा, तरबूज और लड्डुओं को भेाग लगाकर दान करना चाहिए।
क्या है महत्व अक्षय तृतीया का
रवींद्र कुमार मिश्र का कहना है कि भारतीय लोक मानस सदैवऋतु पर्व मनाता रहा है। पर्व और त्योहार की एक शृंखला लोक जीवन को निरंतर आबद्ध किए हुए हैं। इसी शृंखला में अक्षय तृतीया का पर्व वसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है।
वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जानेवाला यह व्रतपर्व लोक में बहुमान्य है। पुरानों में इसका विस्तृत उल्लेख है। इस व्रत की कथाएं भी हर सनातन धर्मी गृहस्थ इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। अक्षय तृतीया को दिए गए दान और किए गए स्नान, जप, तप हवन आदि कार्यों का शुभ और अनंत फल है।
सभी कर्मों का फल अक्षय
भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है। इसलिए इसका नाम अक्षय है। यदि यह तृतीया कृतिका नक्षत्र से युक्त हो तो विशेष फलदायिनी होती है।
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि को युगादि तिथियों में गणना होती है। क्योंकि कृतयुग (सतयुग) का कल्पभेद से त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है।
इस दिन कलश, जल पात्र, खड़ाऊं, चप्पल जूता, पंखा, छाता, गौ भूमि, स्वर्ण एवं रजत पात्र आदि का दान परम कल्याण कारी होता है। इस दिन जिन जिन वस्तुओं का दान किया जाता है वह समस्त वस्तुएं स्वर्ग में ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त होती है।
बद्री नाथ का पट खुलेगा
इस दिन बदरिकाश्रम में भगवान बद्रीनाथ के पट खुलते हैं। और भगवान लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। इस दिन गंगा स्नान को अति पुण्यकारी माना जात है।
मृत पितरों का तिल जल से तर्पण और पिंडदान की इस दिन पूरे विश्वास के साथ किया जाता है कि अक्षय फल मिलेगा। इसी दिन नर नारायण, परशुराम और हयग्रीव का भी अवतार हुआ था। इसलिए इनकी ज्यंतियां भी मनाई जाती हैं। यह तिथि बहुत ही सुख और सौभाग्य को देनेवाली है।
महत्वपूर्ण बात
इस वर्ष का एक और महत्वपूर्ण बिंदू यह भी है कि तृतीया के साथ चतुर्थी का संयोग भी अधिक पुण्यकारक हो गया है। तृतीया तिथि की स्वामिनी माता गौरी और चतुर्थी के गणेश का उत्तम संयोग है।
इस दिन सुख समृद्धि और सफलता की कमान के साथ व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र शस्त्र, वस्त्र आभूषण आदि बनवाना कर धारण करना चाहिए। नयी भूमि का क्रय, भवन संस्था दुकान आदि का प्रवेश इस तिथि को महान शुभ फलदायी है।
किस राशि को क्या खरीदें और क्या दान करें
राशि.......................क्रय.......................दान
मेष.......................सोना, तांबा.......................चांदी, कांसा
वृष.......................चांदी, कांसा.......................स्वर्ण
मिथुन.......................वस्त्र, आभूषण....................... लोहा, तांबा
कर्क.......................चांदी, सोना.......................वस्त्र, आभूषण
सिंह.......................चांदी, सोना.......................तांबा, कांसा
कन्या.......................वस्त्र, भूमि.......................लोहा, चांदी
तुला.......................कांसा, लोहा.......................सोना, चांदी
वृश्चिक.......................तांबा, सोना चांदी.......................लोहा, कांसा
धनु.......................सोना, कांसा.......................चांदी, लोहा
मकर.......................मशीनरी, तांबा.......................वस्त्र, सोना
कुंभ.......................सोना चांदी.......................सोना, वस्त्र
मीन.......................चांदी, सोना.......................तांबा, कांसा