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पीजीआई में इलाज कराने की सोच रहे हैं तो पहले ये खबर पढ़ लें

Fri, 22 Apr 2016 10:09 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पीजीआई चंडीगढ़ - फोटो : demo pics
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पीजीआई में इलाज न मिलने की एक नई तस्वीर सामने आई है। वार्ड में दाखिल मरीज इलाज बीच में छोड़कर ‘भाग’ रहे हैं। एक अप्रैल 2015 से 30 मार्च 2016 तक  कुल 473 मरीज अपना ट्रीटमेंट कराए बिना ही पीजीआई से चले गए। ये सभी मरीज पीजीआई के अलग-अलग वार्ड में दाखिल थे।
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पीजीआई ने इन मरीजों को ‘एब्सकॉन्डिंग’ यानी फरार की श्रेणी में रखा है। पहली बार किसी हास्पिटल से इस तरह का डाटा हासिल हुआ है। यह डाटा बताता है कि  पीजीआई में मरीजों की हालत कितनी दयनीय है। एक साल में बिना बताए कितने मरीज पीजीआई को छोड़कर चले गए, उसकी पूरी लिस्ट अमर उजाला के पास है।

इसलिए भागते हैं मरीज: पीजीआई से जुड़े एक विशेषज्ञ ने बताया कि ऐसे मरीजों को चिकित्सा भाषा में लेफ्ट अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस (लाफा) कहा जाता है। ऐसे लोग तभी हास्पिटल छोड़ते हैं, जब वह चिकित्सा सुविधाओं से संतुष्ट नहीं होते। मरीज जब वार्ड में होता है तो डॉक्टर या तो उन्हें देखने नहीं आता या फिर उन्हें इलाज में लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो डिस्चार्ज स्लिप में लंबा इंतजार करना पड़ जाता है। इमरजेंसी में मरीज पड़े रहते हैं। जिनकी सर्जरी होनी है, वह वार्ड में पड़े रह जाते हैं। उनका नंबर ही नहीं आता है। ऐसे में मरीज सोचता है कि यहां से निकलना ही मुनासिब है।
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क्या कहना है मरीजों का: चंडीगढ़ सेक्टर 38 निवासी जोगिंदर ने बताया कि उनके भाई का एक्सीडेंट हो गया था। वह काफी दिन तक इमरजेंसी में दाखिल रहा। डॉक्टर रोजाना तारीख पर तारीख दे रहे थे। सामान भी आ गया। बाद में कहने लगे घाव सूखने दें। बाद में आपरेशन कर देंगे। हास्पिटल में दाखिल हुए 20 दिन से ज्यादा हो गया और पेशेंट की हालत खराब होती जा रही थी। इसलिए वहां से निकल गए और प्राइवेट हास्पिटल में दिखाया। प्राइवेट में रुपया भले ही ज्यादा लग गया, लेकिन पेशेंट को राहत मिल गई। चंडीगढ़ के नरेंद्र का कहना था कि उनकी मां का कूल्हा टूट गया था। वह इमरजेंसी में दाखिल रहीं। डॉक्टर हर बार तारीख पर तारीख देते रहे और इलाज के इंतजार में उनकी मौत हो गई।

किस डिपार्टमेंट में कितने मरीज भागे
डिपार्टमेंट--------------मरीज
कार्डियोलॉजी----------11
स्किन------------------03
ड्रग डी एडिक्शन----------12
इंडोक्राइनोलॉजी---------- 06
गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी---------- 23
जनरल सर्जरी----------07
गाइनेकोलॉजी यूनिट (1)--42
गाइनेकोलॉजी यूनिट (2)--28
गाइनेकोलॉजी यूनिट (3)--32
हीप्टोलॉजी----------------- 05
इंटरनल मेडिसिन-----------15
नेफ्रोलॉजी-------------------09
न्यूरोलाजी/सर्जरी जनरल----04
न्यूरोसर्जरी------------------- 61
आप्थलमोलॉजी---------------02
ऑरथोपीडिक्स--------------- 31
ईएनटी गले की सर्जरी-------- 06
पीडियाट्रिक सर्जरी-------------03
पीडियाट्रिक ऑरथोपीडिक्स----01
पीडियाट्रिक मेडिसिन-----------117
प्लास्टिक सर्जरी-----------------32
मनोचिकित्सक-------------------01
पल्मनरी मेडिसिन---------------04
यूरोलॉजी------------------------18

अश्विनी मुंजाल, जनरल सेक्रेटरी एमटीए पीजीआई ने बताया कि पीजीआई का निर्माण आम मरीजों के इलाज के लिए हुआ था, लेकिन पिछले 15 वर्षों से यहां पर एक वीआईपी कल्चर बन गया है। वीआईपी को बेड मिल जाता है, लेकिन गरीब व्यक्ति को नहीं मिलता। वीआईपी को ऑपरेशन की तारीख मिल जाती, लेकिन आम मरीजों को धक्के खाने पड़ते हैं। इससे पीजीआई के कुछ प्रोफेसर व स्टाफ कर्मी भी परेशान हैं। न तो यहां वेंटीलेटर मिलता है और न ही बेड। कब तक मरीज ट्राली पर पड़ा रहेगा। उसमें इंफेक्शन फैलने का डर रहता है। ऐसी स्थिति परिजन क्या करेंगे। पीजीआई से भागना ही वह सबसे मुनासिब समझते हैं।
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