हरियाणा में बहुजन समाज पार्टी अपना 21 साल पुराना रिकार्ड तोड़ पाएगी या फिर हाथी थककर बैठ जाएगा, इसका फैसला 23 मई को होगा। इस चुनाव में बसपा ने हरियाणा में भी अपने नए साथी के साथ अपनी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का कार्ड जरूर खेला। लेकिन यह ज्यादा असरदार रहेगा, फिलहाल ऐसी संभावनाएं कम ही दिख रही हैं। क्योंकि अधिकतर सीटों पर बसपा के प्रत्याशी चुनावी रण के मुकाबले कमजोर ही दिखे।
हरियाणा में इस लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बहुजन समाज पार्टी के हाथी ने इनेलो का चश्मा उतारकर भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) के ऑटो रिक्शा (चुनावी चिह्न) की सवारी कर ली थी। इनेलो के पारिवारिक विघटन का हवाला देकर बसपा ने हरियाणा में इनेलो से नाता तोड़ लोसुपा से गठबंधन कर लिया था। इस गठबंधन के बाद बसपा ने हरियाणा की कुल 10 संसदीय सीटों में से 8 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। जबकि 2 सीटों पर लोसुपा उतरी।
इस चुनाव में भी बसपा ने अपने सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के तहत अनुसूचित और पिछड़ा जाति को साधते हुए अन्य बिरादरियों को भी साथ जोड़ने की कोशिश की। इसी के चलते बसपा ने इस बार अनुसूचित और पिछड़ा जाति के साथ-साथ जाट, ब्राह्मण, विश्वकर्मा व मुस्लिम समाज के लोगों तक को टिकट देकर रणनीतिक ढंग से जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है। रणनीति अच्छी थी, लेकिन चेहरे चर्चित और दमदार नहीं थे। बहरहाल, अब इंतजार परिणाम का है और नतीजे ही तय करेंगे कि लोसुपा से गठबंधन कर बसपा के हाथी की चाल सूबे में कैसी रहेगी।