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ये दास्तां पिंजौर ब्लॉक के मंगनीवाला पंचायत के गांव बाजेवाला की है, जहां आज भी सडक़ें नहीं बनी

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केरोसिन मुक्त जिले में नहीं मिल रहा गैस कनेक्शन
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लकड़ी तोड़ने गई बेटी की रीढ़ की हड्डी टूटी दो साल से बिस्तर पर
पिंजौर ब्लॉक के मंगनीवाला पंचायत के गांव बाजेवाला में आज भी नहीं सड़क
पंचायत के निशक्तों को भी पथरीले रास्ते से शहर इलाज के लिए जाना पड़ता है
सरकार का दावा 1966 से 67 में 1386 किमी पक्की सड़कें गांवों से जुड़ी थीं 2016-2017 में ये आंकड़ा 100 फीसदी पहुंचा
100 फीसदी गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ने का दावा हकीकत से परे
दीपक शाही
पंचकूला।
वह सुबह बहुत मनहूस थी। बेटी सपना बिना खाए स्कूल जाने को तैयार हो रही थी। लेकिन सभी को खाना चाहिए था। बेटी को जंगल से लकड़ियां लाने को कहा। वह लकड़ी लाने जंगल गई। लड़की तोड़ने के लिए वह पेड़ पर चढ़ी और पैर स्लिप होने से नीचे आ गिरी। आनन फानन में पड़ोस के लोग अस्पताल लेकर गए तो डॉक्टर ने कहा रीढ़ की हड्डी टूट गई है। अब आपकी बेटी चल फिर नहीं सकती। क्या सभी योजनाएं नाम की होती हैं, इसका लाभ गरीबों को नहीं मिल सकता। एक मां का दर्द उसके आंखों से झलक रहा है। लेकिन सरकार की उज्ज्वला योजना का लाभ आज तक इन्हें नहीं मिला। ये दास्तां है पिंजौर ब्लॉक के मंगनीवाला पंचायत के गांव बाजेवाला की है। पेश है एक रिपोर्ट।
सपना की मां सुनीता ने बताया कि अब तो पंचकूला में केरोसिन तेल भी नहीं मिलता। रसोई गैस के लिए अप्लाई किया था। लेकिन नहीं दी जा रही है। खाना पकाने के लिए जंगल से लकड़ी लाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। यही नहीं लोग नदी के रास्ते पथरीले रास्तों से शहर पहुंचते हैं। इस पंचायत में करीब चार हजार लोग रहते हैं ये पिंजौर में मात्र दस से बारह किमी दूर है।
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टीचर बनना चाहती थी सपना
सपना ने बताया कि उसे पढ़ने की इच्छा है, लेकिन वह अब चल नहीं सकती। स्कूल कैसे जाए। जब वह पेड़ से गिरी थी। तब वह आठवीं में थी। उस दिन में बाद न तो वह घर के बाहर गई और न ही उसे शिक्षा मिल पाई। वह टीचर बनना चाहती थीं। लेकिन सपना का सपना दिल में ही रह गया।
100 फीसदी गांवों में पक्की सड़कों का दावा हकीकत से परे
प्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा के 1966 से 67 में 1386 किमी पक्की सड़कें गांवों से जुड़ी थीं। लेकिन 2016-2017 में ये आंकड़ा 100 फीसदी हो चुका है। लेकिन ये दावा हकीकत से परे है। अभी पंचकूला में कई ऐसे गांव हैं, जहां लोग अपने घर तक नदियों से होकर जाते हैं। उनके गांव के लिए पक्की सड़कें नहीं हैं।
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निशक्तों को भी चलना पड़ता है पथरीले रास्तों पर
बाजेवाला गांव के दिव्यांग आसाराम ने बताया कि अब पथरीले रास्तों पर नहीं चला जाता है। करीब डेढ़ साल पहले बसी पंचायत में आज भी शहर से जोड़ने वाली सड़क नहीं बनी। लोग नदी क्रॉस कर शहर तक पहुंचते हैं। कोई बीमार पड़ जाए तो चारपाई पर उठाकर पांच किमी पैदल नदी के रास्तों से शहर तक जाना पड़ता है।
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