क्या है डिबेंचर?
डिबेंचर इक्विटी शेयरों से भिन्न, एक तरह का ऋण का साधन है। इसके माध्यम से सरकार या कंपनियां धन जुटाती हैं। डिबेंचर खरीदने वाला वास्तव में कर्जदाता होता है। डिबेंचर जारी करने वाली कंपनी गिरवी के तौर पर कुछ नहीं रखती, लेकिन खरीदार उनकी साख और प्रतिष्ठा को देखते हुए डिबेंचर खरीदते हैं। डिबेंचर जारी करने वाली कंपनी या संस्थान कर्जदाताओं (डिबेंचर खरीदने वालों को) निश्चित ब्याज देते हैं।
कंपनियों के लिए ब्याज देना जरूरी
कंपनियां शेयरधारकों को भले ही लाभांश नहीं दे लेकिन उसे कर्जदाताओं (डिबेंचरधारकों) को ब्याज देना अनिवार्य होता है। सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला ट्रेजरी बॉन्ड या ट्रेजरी बिल आदि भी जोखिम रहित डिबेंचर ही होते हैं।
एफडी से लाभदायक हो सकता है डिबेंचर
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती से बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की ब्याज दरें काफी नीचे रखी हैं। मौजूदा समय में ज्यादातर बैंक पांच से छह फीसदी की दर पर एफडी की पेशकश कर रहे हैं। ऐसे में आपके लिए डिबेंचर निर्गम में निवेश करना लाभदायक साबित हो सकता है।
दो प्रकार के होते हैं डिबेंचर
- पहला - परिवर्तनीय डिबेंचर या परिवर्तनीय बॉन्ड ऐसे बॉन्ड होते हैं, जिन्हें पूर्व निर्धारित अवधि के बाद जारी करने वाली कंपनी के इक्विटी शेयरों में परिवर्तित कर सकते हैं। ये डिबेंचर पूरी तरह से, आंशिक या वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय हो सकते हैं। निवेशकों को कंपनी द्वारा किए जा रहे ब्याज के भुगतान से फायदा होता है और उनके पास लोन को इक्विटी में बदलने का विकल्प भी होता है। इस तरह ये कंपनी की वृद्धि में हिस्सेदार बन सकते हैं।
- दूसरा - अपरिवर्तनीय डिबेंचर केवल नियमित डिबेंचर होते हैं। यानी इन्हें उत्तरदायी कंपनी के इक्विटी शेयरों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, आम तौर पर परिवर्तनीय प्रतिरूप के मुकाबले उन पर उच्च ब्याज दर लगता है।