मतदाताओं तक पहुंच बनाने में सोशल मीडिया की भूमिका को राजनीतिक दलों ने समझ तो करीब एक दशक पहले ही लिया था, लेकिन देश में पिछले लोकसभा चुनावों तक, यानी वर्ष 2014 तक भी इंटरनेट का प्रयोग करने वाले लोग कुल आबादी के 20 फीसदी के बराबर भी नहीं थे। सोशल नेटवर्क से तो दस फीसदी लोग भी नहीं जुड़े हुए थे। इसके बावजूद भाजपा और कांग्रेस सहित कई बड़े राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया के माध्यम से वोटर को प्रभावित करने में बड़ी ताकत झोंकी थी।
इसमें खास तौर से भाजपा को बड़ी कामयाबी मिली। पिछले पांच सालों में सोशल मीडिया की खुद की ताकत भी जबर्दस्त तरीके से बढ़ गई है। स्मार्ट मोबाइल फोन का उपयोग बढ़ने के कारण इसका कैनवास बढ़ता जा रहा है। ऐसे में पार्टियों के लिए यह और भी बड़ा मंच हो गया है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में वर्ष 2014 की तुलना में वर्ष 2018 तक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले दोगुना से ज्यादा, जबकि सोशल नेटवर्क का उपयोग करने वाले तीन गुना से ज्यादा बढ़ गए। वहीं स्मार्ट फोन यूजर भी दोगुना से अधिक हो गए।
इस साल के शुरुआती चार महीनों में, यानी लोकसभा चुनावों तक यह संख्या निश्चित रूप से बढ़नी ही है। एक सर्वे के अनुसार शहरी क्षेत्रों में औसतन 94 फीसदी लोग अपने मोबाइल फोन से इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीण इलाकों में भी यह संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में वोट हासिल करने के लिए स्मार्ट फोन सबसे बड़ा माध्यम बन सकता है। इस लिहाज से इस बार लोकसभा के लिए अब तक का 'सबसे बड़ा डिजिटल चुनाव' भी होगा।
6 लाख में से 43 हजार गांवों में मोबाइल सेवा नहीं
संचार मंत्री मनोज सिन्हा की ओर से पिछले साल लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार जुलाई 2018 तक देश के कुल 5,97,618 गांवों (वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार आबादी वाले गांव) में से 43,088 गांव मोबाइल सेवा से जुड़े हुए नहीं थे। सिन्हा ने बताया था कि देश की करीब 88 फीसदी आबादी को 3जी और 4जी सुविधा उपलब्ध थी।