उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में किसान और छोटे कारोबारी धीरे-धीरे परंपरागत सूदखोरों के चंगुल से निकल रहे हैं। अब इन इलाकों में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का विस्तार की तेजी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल इनका सकल ऋण पोर्टफोलियो -जीएलपी- में डेढ़ सौ से ढाई सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गहरी समझ रखने वाले अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को भी कोट-टाई वाले सूदखोर बताते हैं।
देश के माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की स्व-नियम संगठन माइक्रोफाइनेंस इंस्टीच्यूशंस नेटवर्क -एमएफआईएन- द्वारा जारी होने वाले माइक्रोमीटर रिपोर्ट के 17वें संस्करण के मुताबिक उत्तर भारत के राज्यों में लोग पारंपरिक सूदखोरों के बजाय अब संगठित क्षेत्र से ज्यादा लोन ले रहे हैं। तभी तो वर्ष 2015-16 के दौरान इन इलाकों में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का सकल ऋण पोर्टफोलियो में तीव्र बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक आलोच्य वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के जीएलपी में 183 फीसदी की वृद्घि हुई है। उत्तराखंड में यह वृद्घि 173 फीसदी की रही जबकि दिल्ली में 159 फीसदी। हरियाणा में तो बीते वर्ष इन कंपनियों का जीएलपी 276 फीसदी रहा जबकि पंजाब में यह 245 फीसदी रहा।
एमएएफआईएन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रत्ना विश्वनाथन का कहना है कि पिछले वर्ष माइक्रोफाइनेंस उद्योग में उल्लेखनीय वृद्धि इस बात का संकेत है कि इस क्षेत्र में लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। दिलचस्प यह है कि अब सकल ऋण पोर्टफोलियो के साथ ही ग्राहकों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। इस विकास से पता चलता है कि यह उद्योग अब परिपक्व हो रहा है।