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भारत-चीन कारोबार: निर्यात से चार गुना ज्यादा आयात, चीन का कई क्षेत्रों में आधे से ज्यादा कब्जा

अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 19 Jun 2020 04:14 PM IST
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भारत और चीन के बीच कारोबार - फोटो : Amar Ujala Graphics
पूरे देश में चीनी सामानों के बहिष्कार की मांग फिर उठने लगी है, लेकिन घर-घर में घुस चुके चीनी सामानों को बाहर निकालने का सफर खासा लंबा है, हालांकि नामुमकिन नहीं। कंपनियों और उपभोक्ताओं को सस्ते का मोह छोड़ना होगा और आत्मनिर्भरता का रास्ता अपनाना पड़ेगा, तभी यह संकल्प पूरा हो पाएगा।

सस्ते का मोह छोड़ेंगे, तब ही ड्रैगन से लड़ पाएंगे
जब-जब चीन के साथ भारत का गतिरोध बढ़ता है, तो चीनी सामानों के बहिष्कार का माहौल बनने लगता है। लेकिन हकीकत में सस्ते श्रम और व्यापक स्तर पर विनिर्माण के बूते चीन ने सुनियोजित ढंग से दुनियाभर के बाजारों में कम कीमतों के उत्पादों से कब्जा जमाया है।


यही वजह है कि जिन देशों में ड्रैगन ने पांव पसारे, वहां स्थानीय कंपनियों को मुकाबले से बाहर कर दिया। आज देश में 74% मोबाइल, 50% टीवी, 70% फार्मा एपीआई और 90% सौर उपकरण बाजार चीन के हवाले है। बीते दशकों में देसी कंपनियां न सिर्फ कच्चे माल, बल्कि बड़े-बड़े कलपुर्जों के लिए चीन की इकाइयों पर निर्भर हो गईं।



आलम यह है कि आज भारत निर्यात के मुकाबले चीन से चार गुना से भी ज्यादा आयात करता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पाट्र्स से लेकर दवा बाजार में तो चीन की बड़ी हिस्सेदारी हो गई है, जिसे एक झटके में खत्म कर देना नामुमकिन है। चीन पर निर्भरता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जनवरी से बंद पड़े आयात के कारण देश में फार्मास्युटिकल सामग्रियों की कीमतें 06 से 167 फीसदी तक बढ़ गईं।

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम चीन से निर्भरता खत्म कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकते हैं। लेकिन, इसमें लंबा वक्त लगेगा और तब तक भारतीय कंपनियों और उपभोक्ताओं को सस्ते का मोह भी छोड़ना होगा।
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भारत और चीन के बीच कारोबार - फोटो : Amar Ujala Graphics
पूरे देश में चीनी सामानों के बहिष्कार की मांग फिर उठने लगी है, लेकिन घर-घर में घुस चुके चीनी सामानों को बाहर निकालने का सफर खासा लंबा है, हालांकि नामुमकिन नहीं। कंपनियों और उपभोक्ताओं को सस्ते का मोह छोड़ना होगा और आत्मनिर्भरता का रास्ता अपनाना पड़ेगा, तभी यह संकल्प पूरा हो पाएगा।

सस्ते का मोह छोड़ेंगे, तब ही ड्रैगन से लड़ पाएंगे
जब-जब चीन के साथ भारत का गतिरोध बढ़ता है, तो चीनी सामानों के बहिष्कार का माहौल बनने लगता है। लेकिन हकीकत में सस्ते श्रम और व्यापक स्तर पर विनिर्माण के बूते चीन ने सुनियोजित ढंग से दुनियाभर के बाजारों में कम कीमतों के उत्पादों से कब्जा जमाया है।

यही वजह है कि जिन देशों में ड्रैगन ने पांव पसारे, वहां स्थानीय कंपनियों को मुकाबले से बाहर कर दिया। आज देश में 74% मोबाइल, 50% टीवी, 70% फार्मा एपीआई और 90% सौर उपकरण बाजार चीन के हवाले है। बीते दशकों में देसी कंपनियां न सिर्फ कच्चे माल, बल्कि बड़े-बड़े कलपुर्जों के लिए चीन की इकाइयों पर निर्भर हो गईं।



आलम यह है कि आज भारत निर्यात के मुकाबले चीन से चार गुना से भी ज्यादा आयात करता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पाट्र्स से लेकर दवा बाजार में तो चीन की बड़ी हिस्सेदारी हो गई है, जिसे एक झटके में खत्म कर देना नामुमकिन है। चीन पर निर्भरता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जनवरी से बंद पड़े आयात के कारण देश में फार्मास्युटिकल सामग्रियों की कीमतें 06 से 167 फीसदी तक बढ़ गईं।

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम चीन से निर्भरता खत्म कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकते हैं। लेकिन, इसमें लंबा वक्त लगेगा और तब तक भारतीय कंपनियों और उपभोक्ताओं को सस्ते का मोह भी छोड़ना होगा।

18 अरब डॉलर के कलपुर्जों का आयात, निर्यात 30 करोड़ डॉलर

भारत में ऑटोमोबाइल बाजार 4.27 लाख करोड़ रुपये का है। इसमें से करीब 25% आयात चीन से होता है। यानी ड्रैगन सालभर में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कलपुर्जे बेचता है। मारुति जैसी बड़ी कंपनियां भी चीन से पुर्जे मंगाती हैं। वहीं, 81% मोटरसाइकिल-साइकिल और ऑटो उद्योग सालाना 18 अरब डॉलर के पुर्जे चीन से मंगाता है। इस क्षेत्र में चीन को निर्यात महज 30 करोड़ डॉलर का ही है।  

इलेक्ट्रॉनिक सामानों में अकेले चीन की हिस्सेदारी 45 फीसदी
भारत में कुल इलेक्ट्रॉनिक सामानों के आयात में अकेले चीन की हिस्सेदारी 45 फीसदी है। भारत में अकेला मोबाइल फोन बाजार कुल दो लाख करोड़ का है। इसमें चीनी कंपनियों ने 74 फीसदी हिस्से पर कब्जा जमा रखा है।

भारत में कुछ खास मोबाइल कंपोनेंट्स का 90 फीसदी तक आयात चीन से होता है। वहीं, एसी की बात करें तो भारत अपनी जरूरत का 28 फीसदी आयात चीन से करता है। साथ ही कंप्रेसर जैसे पुर्जे भी चीन से ही मंगाए जाते हैं। 66 फीसदी खिलौने और 50 फीसदी फर्नीचर भी चीन बेच रहा है।

टेलीकॉम : एक चौथाई हिस्सा

भारत में टेलीकॉम उपकरण बाजार 12 हजार करोड़ का है। इसमें चीनी कंपनियों की 25% हिस्सेदारी है। कई अमेरिकी व यूरोपीय कंपनियां भी बाजार में हैं लेकिन चीन को हटाने से ही उपकरणों की कीमतें 15% तक बढ़ जाएंगी।

फार्मा एपीआई पर 70% निर्भरता  
  • भारत दवा निर्यात में शीर्ष देशों में से एक है। लेकिन कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। भारत में दवा निर्माता कंपनियां 70% एपीआई यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल्स इंग्रीडिएंट्स चीन से मंगाती हैं। 
  • 2018-19 में 240 करोड़ रुपये के एपीआई चीन से आयात हुए। 75% एंटीबायोटिक्स बाजार पर भी चीन का कब्जा।

हमसे कच्चा माल मंगाकर हमें ही महंगे उत्पाद बेचता है चीन

भारत से चीन को निर्यात होने वाला आधा सामान कच्चा माल होता है। वहीं, चीन से आयातित अधिकांश सामान विनिर्मित होता है। कुछ उत्पाद को ऐसे हैं, जिनका कच्चा माल चीन हमसे मंगाकर उनसे बने उत्पाद हमें बेचता है।

मसलन, पिछले साल करीब 3,900 करोड़ रुपये का लोहा व स्टील चीन ने भारत से मंगाया और बदले में स्टील से बने 12 हजार करोड़ रुपये के उत्पाद निर्यात किए। चीन द्वारा निर्यात की जाने वाली शीर्ष दस वस्तुओं में से नौ भारत के कच्चे बाल से बनी होती हैं।

कौशल व क्षमता बढ़ा लें तो चीन की जरूरत नहीं
संस्थागत सुधार और उचित नीति के जरिए हम मोबाइल, फार्मास्युटिकल से लेकर ऑटोमोबाइल क्षेत्र में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ा सकते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगेगा। चीनी आयात को एकदम से रोकना आसान नहीं है क्योंकि इससे पूरी बाजार शृंखला टूट जाएगी। हमें यह शृंखला तैयार करने के लिए भारत में ही कौशल, गुणवत्ता और क्षमता विकसित करनी होगी।

सौर ऊर्जा : संभावना भारत में लेकिन उपकरण चीनी

भारत उर्जा नवीनीकरण की ओर तेजी से बढ़ रहा है। सौर ऊर्जा का बाजार का आकार पिछले कुछ वर्षों में बढ़कर करीब 38 हजार मेगावाट का हो गया है। हैरानी की बात है कि इसमें 90% हिस्सेदारी चीनी कंपनियों की है।  

नियंत्रण की कोशिशें हुईं शुरू
  • भारत ने एफडीआई नीति बदली। अब हर तरह के चीनी निवेश पर सरकार की मंजूरी जरूरी।
  • आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों में आयात घटाने पर जोर।
  • घरेलू एक्टिव फार्मास्युटिकल्स इंग्रीडिएंट्स को प्रोत्साहन
  • बीएसएनएल-एमटीएनएल 4जी में चीनी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। 5जी में भी चीनी कंपनी हुवावे हो सकती है बाहर। 
  • चीन से आने वाले उत्पादों को एंटी डंपिंग शुल्क से राहत की मांग ठुकराई।
  • देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर में काम कर रही चीनी कंपनियों की समीक्षा शुरू। रेलवे ने एक टेंडर रद्द भी किया।
  • चीन छोड़ रही कंपनियों को भारत कर रहा है आकर्षित।

भारत को बड़ा व्यापार घाटा, ड्रैगन सरप्लस में : निर्यात का चार गुना से भी ज्यादा आयात

पिछले साल 11 महीनों को ही देखें तो चीन के खाते में 47 अरब डॉलर का कारोबार सरप्लस रहा। भारत ने साढ़े 15 अरब डॉलर का निर्यात किया तो 62 अरब डॉलर से ज्यादा का सामान आयात किया। इससे व्यापार घाटे में वृद्धि होना लाजिमी है। 

घटा चीनी प्रत्यक्ष विदेश निवेश
  • 2017: 35 करोड़ डॉलर
  • 2019: 22.9 करोड़ डॉलर
  • साल 2000 से अब तक कुल 238 करोड़ डॉलर

...लेकिन स्टार्टअप में बढ़ा चीनी निवेश

90 स्टार्ट अप में चार अरब डॉलर से ज्यादा निवेश कर रखा है-पेटीएम, बायजू, ओयो, ओला, स्विगी, बिग बास्केट, जोमैटो में चीनी पैसा लगा है।

प्रमुख आयातित सामान (अप्रैल 2019-फरवरी 2020)
  • इलेक्ट्रिकल मशीनरी-उपकरण 18.11
  • मैकेनिकल मशीनरी-अप्लायंस 12.78
  • ऑर्गेनिक रसायन 07.53
  • प्लास्टिक 02.58
  • फर्टिलाइजर 001.80
    राशि (अरब डॉलर)
भारत-चीन कारोबार
  • 74% मोबाइल
  • 70% फार्मा एपीआई
  • 50% टीवी/ स्क्रीन
  • 90% सौर बाजार पर चीन का कब्जा
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