पूरे देश में चीनी सामानों के बहिष्कार की मांग फिर उठने लगी है, लेकिन घर-घर में घुस चुके चीनी सामानों को बाहर निकालने का सफर खासा लंबा है, हालांकि नामुमकिन नहीं। कंपनियों और उपभोक्ताओं को सस्ते का मोह छोड़ना होगा और आत्मनिर्भरता का रास्ता अपनाना पड़ेगा, तभी यह संकल्प पूरा हो पाएगा।
सस्ते का मोह छोड़ेंगे, तब ही ड्रैगन से लड़ पाएंगे
जब-जब चीन के साथ भारत का गतिरोध बढ़ता है, तो चीनी सामानों के बहिष्कार का माहौल बनने लगता है। लेकिन हकीकत में सस्ते श्रम और व्यापक स्तर पर विनिर्माण के बूते चीन ने सुनियोजित ढंग से दुनियाभर के बाजारों में कम कीमतों के उत्पादों से कब्जा जमाया है।
यही वजह है कि जिन देशों में ड्रैगन ने पांव पसारे, वहां स्थानीय कंपनियों को मुकाबले से बाहर कर दिया। आज देश में 74% मोबाइल, 50% टीवी, 70% फार्मा एपीआई और 90% सौर उपकरण बाजार चीन के हवाले है। बीते दशकों में देसी कंपनियां न सिर्फ कच्चे माल, बल्कि बड़े-बड़े कलपुर्जों के लिए चीन की इकाइयों पर निर्भर हो गईं।
आलम यह है कि आज भारत निर्यात के मुकाबले चीन से चार गुना से भी ज्यादा आयात करता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पाट्र्स से लेकर दवा बाजार में तो चीन की बड़ी हिस्सेदारी हो गई है, जिसे एक झटके में खत्म कर देना नामुमकिन है। चीन पर निर्भरता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जनवरी से बंद पड़े आयात के कारण देश में फार्मास्युटिकल सामग्रियों की कीमतें 06 से 167 फीसदी तक बढ़ गईं।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम चीन से निर्भरता खत्म कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकते हैं। लेकिन, इसमें लंबा वक्त लगेगा और तब तक भारतीय कंपनियों और उपभोक्ताओं को सस्ते का मोह भी छोड़ना होगा।