इस मौके पर अढिया ने कहा कि किसी तकनीक के सही तरीके से काम नहीं करने के लिए किसी संगठन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। तकनीक में दिक्कतें आती रहती हैं, उसमें बदलाव होते हैं और सुधार भी होता है।
इसके लिए किसी संगठन के अधिकारियों को कैसे जिम्मेदार मान लें। उल्लेखनीय है कि जीएसटी के लिए पोर्टल बनाने और चलाने की जिम्मेदारी जीएसटी नेटवर्क को मिली है और इस पोर्टल पर शुरू में काफी दिक्कतें आई थीं। इसके बाद जब फरवरी 2018 में ई-वे बिल प्रणाली को लागू किया जा रहा था, तब भी दिक्कतें पेश आईं। इसके बाद ई-वे बिल प्रणाली को एक अप्रैल, 2018 से लागू किया जा सका।
छोटे बदलाव में भी लगता है वक्त
वित्त सचिव ने उद्योगपतियों से कहा कि वे जीएसटी में किसी भी बदलाव के लिए जो प्रतिवेदन देते हैं, उस पर सक्षम प्राधिकरण से अनुमति लेनी पड़ती है। उसके बाद भी बदलाव में वक्त लगता है। उन्होंने कहा कि यदि सिस्टम में एक कॉलम भी जोड़ना या घटाना हो, तो कई सप्ताह का समय लग जाता है।
अढिया ने कहा अधिकतर कारोबारी अंतिम दिनों में रिटर्न दाखिल करते हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है कि अंतिम समय में हड़बड़ी रहती है और हड़बड़ी में ही गड़बड़ होता है। इसी गड़बड़ी की वजह से रिफंड अटकता है और कारोबारी इसके लिए सरकार को दोष देते हैं। जीएसटी प्रणाली में शत प्रतिशत रिटर्न ऑटोमेटिक कर दिया गया है। लेकिन यह ऑटोमेटिक तरीके से तभी काम करेगा, जब रिटर्न में कोई गड़बड़ी नहीं हो।
पेट्रोलियम उत्पाद चरणबद्ध रूप से जीएसटी में आएंगे
पेट्रोलियम उत्पादों को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने पर विचार जीएसटी परिषद करेगा और यह चरणबद्ध रूप से हो सकता है। मु्द्दे पर केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क विभाग के चेयरमैन एस. रमेश ने कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की मांग हो रही है, लेकिन इस प्रक्रिया को किस तरह अंजाम दिया जाएगा, इसपर फैसला जीएसटी परिषद को लेना है।
वर्तमान में डीजल, पेट्रोल, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस तथा विमान ईंधन जीएसटी के दायरे से बाहर है और इन पर राज्य सरकारों को मूल्य वर्धित कर लगाने का अधिकार है। अढिया ने यहां एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि हमारे सामने मांग आई है। हम देखेंगे। सबकुछ चरणबद्ध रूप में होगा।