यूरोपीय देश जर्मनी में भी आयकर की संघीय और प्रांतीय व्यवस्था है, लेकिन कर निर्धारण करते समय नागरिकों की क्षमता, करारोपण में समानता और कानून सम्मत होने का ध्यान रखा जाता है। इसके अलावा कृषि और फॉरेस्ट्री से प्राप्त आय, व्यवसाय से आय, पेशेवर की आय, नौकरीपेशा की आय, पूंजीगत लाभ, संपत्ति लाभ या अन्य स्रोत से होने वाली आय पर अलग-अलग श्रेणियों में गणना की जाती है।
लेकिन यहां भी नागरिकों को कर बचाने के लिए निवेश के कोई विकल्प नहीं दिए जाते। यानी, जर्मनी में कमाई करने वाले को सीधे तौर पर निश्चित मात्रा में टैक्स अदा करना होता है।
अमेरिका की तर्ज पर अगर भारत सरकार नई कर व्यवस्था को पूरी तरह लागू करती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक सुरक्षा की आएगी। अमेरिका में नागरिकों से सीधे तौर पर कर वसूलने के साथ सरकार उन्हें कई तरह की सामाजिक सुरक्षा भी मुहैया कराती है। इसमें छह योजनाएं प्रमुख तौर पर आती हैं।
जरूरतमंद परिवारों की सहायता, जिसके तक मार्च, 2019 तक तीन सदस्यों वाले परिवार (करीब 20 लाख नागरिक) को 486 डॉलर प्रतिमाह दिए गए। मेडिकेड योजना के तहत 7.1 करोड़ नागरिकों को चिकित्सा सुविधा दी गई। पोषण पूरक योजना में 3.4 करोड़ नागरिकों को प्रतिमाह 129.97 डॉलर की मदद मिली।
आर्थिक मदद योजना के तहत 80 लाख नागरिकों को प्रतिमाह 567.39 डॉलर दिए गए। इसी तरह, इनकम टैक्स क्रेडिट के रूप में सालाना 55,884 डॉलर से कम कमाने वाले 2.2 नागरिकों को 3,191 डॉलर सालाना की मदद दी गई। हाउसिंग असिस्सेंट योजना के तहत 22 लाख परिवारों को आवास सुविधा मुहैया कराई गई। हालांकि, मोदी सरकार भी आवास योजना, आयुष्मान भारत योजना, न्यूनतम आय गारंटी योजना के जरिये इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन अभी रास्ता काफी लंबा है।
सबसे ऊंची आयकर दर वाले देश
डेनमार्क 0-63 फीसदी
फ्रांस 0-50 फीसदी (21 फीसदी सोशल चार्ज)
चीन 5-45 फीसदी
ऑस्ट्रेलिया 0-45 फीसदी