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फ्री बेसिक्स इंटरनेट फेसबुक के हित में या आपके?

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इंटरनेट और टेलीकॉम कंपनियां चाहती हैं कि भारत के लोगों तक सस्ती से सस्ती इंटरनेट सर्विस पहुंचाई जाए ताकि लोग अपने मोबाइल फोन इस्तेमाल करके ऑनलाइन आ जाएं।
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सरकार की भी यही कोशिश है कि अगर पॉलिसी में बदलाव करके अधिक लोग ऑनलाइन हो सकते हैं तो इंटरनेट के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक फायदा पहुंचाया जा सकता है।

फेसबुक इस पूरे मामले को और आगे ले गया। रिलायंस कम्युनिकेशंस के साथ मिलकर उसने ग्राहकों के लिए ऐसी स्कीम पेश की जिसमें फेसबुक पर जाने के लिए लोगों को पैसा नहीं देना होगा।
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कुछ लोगों का कहना है कि किसी एक वेबसाइट का फ्री होना बाकी साइटों के हित में नहीं है और इससे एक तरह के एकाधिकार को बढ़ावा मिलेगा।

रिलायंस और फेसबुक की इस जुगलबंदी को 'फ्री बेसिक्स' कहा जा रहा है।

कुछ पक्ष में तो कुछ विपक्ष में

जो लोग फ्री बेसिक्स के पक्ष में हैं, उनका कहना है कि लोगों तक इंटरनेट की सुविधा पहुंचाने के लिए कुछ भी करना जायज है।

लेकिन अगर लोग पैसे नहीं देंगे तो आखिर इसका खर्च कौन उठाएगा? टेलीकॉम कंपनियों को फेसबुक से तो पैसे मिलेंगे ही।

उसके अलावा संभव है कि दूसरी सर्विस एक्सेस करने के लिए अधिक पैसे लेकर इस कमी की भरपाई की जाए।

लेकिन क्या फ्री बेसिक्स लोगों तक इंटरनेट पहुंचाने में वाकई मदद कर सकता है?

इसका विरोध करने वालों का कहना है कि 2015 में फ्री बेसिक्स के बिना भी देश में 10 करोड़ नए लोग इंटरनेट से जुड़े, लेकिन फ्री बेसिक्स से जुड़े लोगों का कहना है कि इससे इंटरनेट लोगों तक पहुंचाने की रफ्तार और तेज हो जाएगी।

असल चिंता ये है कि 'फ्री बेसिक्स' एक ओपन प्लेटफार्म नहीं है। यानी इसमें हर कोई शामिल नहीं हो सकता है।

यूजर्स डेटा फेसबुक के पास

फेसबुक ने ये तय करने का अधिकार अपने पास रखा हुआ है, आगे चलकर नीतियों और शर्तों में बदलाव करने का भी अधिकार उसी के पास है।

फेसबुक ये भी तय कर सकता है कि कौन इसमें शामिल होगा और कौन नहीं। अगर कोई कंपनी फेसबुक की पॉलिसी से सहमत नहीं है तो हो सकता है कि उसे 'फ्री बेसिक्स' के प्लेटफार्म पर शामिल नहीं किया जाएगा।

फ्री बेसिक्स पर यूजर्स का जो भी डेटा होगा उसके बारे में जानकारी सिर्फ फेसबुक के पास होगी। अगर कोई वेबसाइट फ्री बेसिक्स के साथ काम करना चाहे तो उसके बारे में सभी जानकारी फेसबुक के पास होगी। यह एक तरह से फेसबुक को बहुत अधिक ताकतवर बना देगा।

कुछ ऐसे सवालों के बीच फेसबुक का ये कहना है कि ये सब प्रचार उन लोगों की तरफ से किया जा रहा है जो उसके खिलाफ अभियान चला रहे हैं। लेकिन इससे जुड़े तकनीकी मुद्दों के बारे में साफ जवाब नहीं मिल रहा है।

भारत में फेसबुक अपने करोड़ों ग्राहकों के बीच फ्री बेसिक्स के समर्थन में अभियान चला रहा है। लोगों से कहा जा रहा है कि वे फ्री बेसिक्स के समर्थन में सरकार को चिट्ठी भेजें।

फेसबुक जमकर कर रहा है विज्ञापन

कई लोगों ने इसे बिना पढ़े ट्राई को भेज दिया है। कुछ ऐसे लोगों ने भी इस तरह के ईमेल भारत के टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई को भेजे हैं जो भारत के बाहर रहते हैं।

हालांकि, फेसबुक ने बाद में कहा कि ऐसे ईमेल गलती से भेजे गए थे। फेसबुक ने लोगों को एक नंबर पर मिस्ड कॉल देकर फ्री बेसिक्स को सपोर्ट करने को कहा है।

इसके अलावा देश के सभी अखबारों में दो-दो पेज के विज्ञापन छापे जा रहे हैं जिनमें फ्री बेसिक्स के समर्थन में तर्क दिए जा रहे हैं।

फ्री बेसिक्स कुछ महीने पहले तक इंटरनेट ऑर्ग कहलाता था। फेसबुक ने इसका नाम बदल दिया है और अब अखबार, इंटरनेट, टेलीविजन और सड़कों पर होर्डिंग पर विज्ञापन देकर अपनी सर्विस को फैलाना चाहता है।

अपने विज्ञापन वो अलग अलग भाषाओं में भी दे रहा है ताकि लोग उसके फ्री बेसिक्स के लिए सरकार को ईमेल भेजें।

अब सवाल उठता है कि आखिर इतना पैसा एक फ्री सर्विस को बढ़ाने के लिए क्यों खर्च किया जा रहा है?

दिसंबर 2015 के अंत तक भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 40 करोड़ पार कर सकती है।
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भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार

भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार है। और चूंकि चीन की तरह भारत सरकार इंटरनेट पर फ्री स्पीच को नहीं रोकती है, इसलिए इंटरनेट से जुडी कंपनियों के लिए भारत का बाजार अहम है।

ट्विटर की दुनिया में अब ये खुली जंग हो गई है और फ्री बेसिक्स के खिलाफ कई लोगों ने आवाज उठाई है।

जिस बाजार में हर साल करीब 10 करोड़ नए ग्राहक जुड़ रहे हैं, अगर वैसे बाजार पर कोई कंपनी अपना दबदबा बना सकती है तो वो इसके लिए कुछ भी करने को तैयार होगी।

लेकिन क्या लोगों को फ्री इंटरनेट के नाम पर लुभाकर ये दबदबा कायम करना आम जनता के हित में होगा?

जल्दी ही गेंद टेलीकॉम नियामक संस्था ट्राई के पाले में होगी और नेट न्यूट्रैलिटी को बनाए रखने का दबाव भी उस पर होगा।
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