नोमुरा के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ते व्यापारिक तनाव के चलते कई विदेशी कंपनियां चीन और अमेरिका में जोखिम का आकलन कर रही हैं। वे अपने कारोबार को किसी नए स्थान पर ले जाने पर जल्द ही फैसला कर सकती हैं।
ऐसे में भारत के पास सबसे बेहतरीन मौका है। एनडीए सरकार की वापसी से राजनीतिक जोखिम भी नहीं रहा। अगर आर्थिक वातावरण में और सुधार आता है तो निश्चित तौर पर एफडीआई के मोर्चे पर भारत को लाभ मिलेगा।
छह साल में पहली बार घटा एफडीआई
पिछले छह वर्षों में पहली बार 2018-19 में भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 1 फीसदी कम हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में कुल एफडीआई 44.37 अरब डॉलर रहा। टेलीकॉम और फार्मा क्षेत्र के निवेश में भारी कमी आई है।
इससे पहले 2017-18 में कुल 44.85 अरब डॉलर का एफडीआई आया था। वित्त वर्ष 2012-13 के बाद से देश का एफडीआई लगातार बढ़ता रहा और सातवें साल इसमें गिरावट आई है। टेलीकॉम क्षेत्र में एफडीआई 2017-18 के 6.21 अरब डॉलर के मुकाबले 2018-19 में महज 2.67 अरब डॉलर रहा।
मोदी की जीत पर 21.63 अरब डॉलर निवेश
23 मई को आम चुनाव का परिणाम आने के दूसरे दिन ही विदेशी निवेशकों ने 21.63 अरब डॉलर का निवेश भारतीय बांड में किया। यह पिछले दो महीने में एक दिन का सबसे ज्यादा विदेशी निवेश रहा है। चुनाव परिणाम के असर से 10 साल का बेंचमार्क 7 आधार अंकों की गिरावट के साथ 7.16 फीसदी पर पहुंच गया और देश में कर्ज की मांग बढ़ने की उम्मीद में विदेशी निवेशकों ने जमकर पैसे लगाए। घरेलू बांड का यह अप्रैल 2018 के बाद सबसे निचला स्तर है, जो 7 फीसदी पर पहुंच सकता है।