भारत के सबसे बड़े और विश्व के 50 बड़े बैंकों में शामिल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चेयरपर्सन अरुधंति भट्टाचार्या को हर साल जितनी सैलरी मिलती है वो प्राइवेट बैंकों के सीईओ को मिलने वाली सैलरी से काफी कम है। भट्टाचार्या को जितनी सैलरी हर महीने मिलती है, उतना तो प्राइवेट बैंक के सीईओ का साल में मिलने वाला बोनस होता है।
भट्टाचार्या के समांतर देश के सबसे बड़े प्राइवेट सेक्टर के बैंक-- आईसीआईसीआईसी बैंक की सीईओ चंदा कोचर को सैलरी मिलती है। चंदा को 2016-17 में 6.09 करोड़ रुपये की सैलरी मिली थी। वहीं भट्टाचार्या को पिछले वित्त वर्ष में 28 लाख रुपये सालाना सैलरी के तौर पर मिले थे। इस सैलरी में बेसिक सैलरी, पीएफ और अन्य एलाउंस शामिल हैं।
हालांकि सबसे ज्यादा सैलरी एचडीएफसी बैंक के एमडी आदित्य पुरी की है। इनको पिछले वित्त वर्ष में 10 करोड़ की सैलरी मिली थी और इसके अलावा 57 करोड़ का स्टॉक ऑप्शन मिला था एक्सिस बैंक की एमडी और सीईओ शिखा शर्मा को बेसिक सैलरी के तौर पर 2.7 करोड़ रुपये मिले थे।
शिखा को इसके अलावा एलाउंस के अलावा 1.35 करोड़ रुपये अलग से मिलते हैं और 90 लाख रुपये बैंक उनको एचआरए के तौर पर दिए थे। यस बैंक के सीईओ राना कपूर को पिछले वित्त वर्ष में 6.8 करोड़ की सैलरी मिली थी।
राजन ने भी रोया था कम सैलरी का दुखड़ा
कम सैलरी की वजह से नहीं मिलते हैं सरकार को बैंकों के लिए टॉप मैनेजर्स मिलने में काफी दिक्कत होती है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी सरकार द्वारा दी जाने वाली कम सैलरी का दुखड़ा रोया था। राजन ने 2016 में कहा था कि सरकार जितनी सैलरी पीएसयू बैंकों के टॉप मैनेजमेंट को देती है, उससे उन्हें प्राइवेट बैंकों से तुलना करना बेकार है।
राजन को खुद आरबीआई गर्वनर के तौर पर जो सैलरी मिलती थी, उसमें बेसिक सैलरी 3 लाख रुपये थी। हालांकि रिजर्व बैंक के गर्वनर और डिप्टी गर्वनर की सैलरी सरकार तय नहीं करती है। इसको आरबीआई का बोर्ड तय करता है कि उनको कितनी सैलरी दी जाएगी।