वित्त मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि राज्यों की माल एवं सेवा कर (जीएसटी) राजस्व संग्रह में कमी को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार 1.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेगी। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि यह कर्ज उपुयक्त किस्तों में लिया जाएगा। जो भी कर्ज लिया जाएगा उसे जीएसटी क्षतपूर्ति उपकर जारी करने के बदले राज्यों को दी जाएगी।
केंद्र और कुछ राज्यों के बीच विवाद का विषय बने जीएसटी क्षतिपूर्ति के मुद्दे को सुलझाने की दिशा में यह अहम कदम माना जा रहा है। कोविड-19 संकट के चलते अर्थव्यवस्था में नरमी से जीएसटी संग्रह कम रहा है। इससे राज्यों का बजट गड़बड़ाया है।
राज्यों ने वैट समेत अन्य स्थानीय कर एवं शुल्कों बदले जीएसटी को स्वीकार किया था। उन्होंने जुलाई 2017 में नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था इस शर्त पर स्वीकार की थी कि राजस्व संग्रह में अगले पांच साल तक किसी भी प्रकार की कमी होने पर उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी।
इस कमी को पूरा करने के लिए बाजार से कर्ज लेने का विकल्प राज्यों को दिया गया था। मगर कुछ राज्य इससे सहमत नहीं थे। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि राज्यों को उनकी खर्च जरूरतों को पूरा करने के लिए उपलब्ध कराई गई मौजूदा कर्ज सीमा के अलावा 1.10 लाख करोड़ रुपये का ऋण लेने को लेकर विशेष व्यवस्था की पेशकश की गई थी।
बयान में कहा गया, 'विशेष व्यवस्था के तहत जीएसटी राजस्व संग्रह में अनुमानित 1.10 लाख करोड़ रुपए की राजस्व क्षतिपूर्ति के लिए भारत सरकार उपयुक्त किस्तों में कर्ज लेगी।' मंत्रालय ने कहा कि इस तरह जो कर्ज लिया जाएगा, उसे जीएसटी क्षतपूर्ति उपकर जारी करने के बदले में राज्यों को दिया जाता रहेगा।
वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत सरकार के कर्ज लेते समय बांड रिटर्न में एकरूपता और बांड नीलामी में अंतराल को सुनिश्चित किया जाएगा। अधिकारी ने कहा कि मूल राशि और ब्याज का भुगतान क्षतिपूर्ति राशि कोष से किया जाएगा। वहीं 1.10 लाख करोड़ रुपए की राशि को तीन से चार साल की अवधि के बॉन्ड जारी करके जुटाया जाएगा।
चिदंबरम ने किया स्वागत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने जीएसटी क्षतिपूर्ति के मुद्दे को सुलझाने के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने संबंधी फैसले का स्वागत किया है। पूर्व वित्त मंत्री ने ट्वीट किया, 'अगर केंद्र सरकार ने 1.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने और इसे राज्यों को देने का फैसला किया है तो मैं उसके बदले हुए रुख का स्वागत करता हूं। मैं उन सभी अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और अखबार संपादकों का धन्यवाद करता हूं जिन्होंने हमारे रुख का समर्थन किया था।'