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क्या हो गई है वैश्विक मंदी की शुरुआत, 2009 के बाद सबसे कम रह सकती है GDP

Sun, 20 Oct 2019 04:00 AM IST
paliwal पालीवाल बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
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gdp down - फोटो : SELF
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) हाल ही में वैश्विक विकास दर (जीडीपी) को लेकर के एक अनुमान जारी कर चुका है। इस अनुमान के मुताबिक वैश्विक जीडीपी तीन फीसदी से नीचे रहेगी। ऐसे में अब सरकारों को बहुत काम करना होगा ताकि मंदी की मार से बचा जाए। हालांकि फिलहाल ऐसा होने की उम्मीद काफी कम लग रही है। यह अनुमान 2009 के बाद का अभी तक का सबसे निचला स्तर है। अगर वैश्विक विकास दर इस साल के अंत में 2.5 फीसदी से कम हो जाती है तो फिर यह पूरी तरह से यकीन हो जाएगा कि मंदी का दौर शुरू हो गया है। 

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इससे लग रहा है कि साल के अंत तक पूरा विश्व मंदी की गिरफ्त में आ जाएगा। जॉर्जिवा ने कहा है कि साल 2019 में दुनिया की 90 फीसदी अर्थव्यवस्था के मंदी के चपेट में आने की आशंका है।आईएमएफ के प्रवक्ता गेरी राईस ने कहा कि, 'अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका दिया है। इससे ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ अगले साल 0.8 फीसदी घटने की आशंका है।'

4.7 से 2.2 फीसदी पर आई ग्रोथ रेट

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार 2018 की शुरुआत में वैश्विक जीडीपी 4.7 फीसदी थी, जोकि इस साल की तीसरी तिमाही में 2.2 फीसदी पर रह गई है। बॉन्ड यील्ड पर निगेटिव रिटर्न मिल रहा है। ऐसी आर्थिक सुस्ती के लिए कई बड़े कारण है, जिसका असर फिलहाल विश्व की सभी विकसित और विकासशील देशों में देखने को मिल रहा है। ज्यादातर देशों की विकास दर का अनुमान घटा दिया गया है। 

यह हैं बड़े कारण

अमेरिका का व्यापार युद्ध

चीन, भारत के बाद अब यूरोप के देशों से अमेरिका में निर्यात होने वाले उत्पादों पर टैरिफ शुल्क को बढ़ा दिया गया है। चीन से अमेरिका का विवाद 18 महीने पुराना है, तो भारत के साथ व्यापार युद्ध की शुरुआत इस साल फरवरी में हुई थी। वहीं यूरोपियन यूनियन के साथ हाल ही में इस युद्ध की शुरुआत हुई है। इस व्यापार युद्ध से कई देशों के आयात-निर्यात पर असर देखने को मिला है। मांग कम होने से उत्पादन ठप हो गया है, जिसकी वजह से रोजगार संकट भी खड़ा हो गया है। 

पांच माह से ऑटो सेक्टर में मंदी
केवल भारत ही नहीं ब्लकि विश्व के कई बड़े देशों के ऑटो सेक्टर इस वक्त मंदी से जूझ रहे हैं। जर्मनी और जापान के अलावा कई अन्य देशों से कारों का निर्यात पूरी तरह से बंद हो गया है। अमेरिका में भी इस सेक्टर में पिछले तीन साल का सबसे कम निवेश किया गया है। इससे ऑटो कंपोनेंट सेक्टर भी प्रभावित हुआ है, जहां पर करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है। 

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क्षेत्रीय असंतुलन
वैश्विक तौर पर कई देशों में कुछ ऐसी घटनाएं भी हुई हैं, जिसका सीधा असर व्यापार पर देखने को मिला है। अमेरिका-चीन के अलावा यूके और यूरोपियन यूनियन में ब्रेक्जिट को लेकर के डील होनी है। वहीं अमेरिका का ईरान के साथ सउदी अरब की तेल कुंओं पर ड्रोन हमले के बाद से गतिरोध बना हुआ है। इसके अलावा ईरान के एक तेल टैंकर ने जेद्दाह के पास हुए धमाके में आग पकड़ ली थी, जिससे कच्चे तेल की कीमतों इजाफा हो सकता है। इराक में हो रहा प्रदर्शन और तुर्की द्वारा सीरिया में हमले की शुरुआत व हांगकांग में पिछले कुछ महीनों से चल रहा मार्च भी अर्थव्यवस्था में मंदी ला सकता है। 

पिछले तीन महीनों में सिंगापुर की विकास दर केवल 3.4 फीसदी रह गई, जो कि 2012 के बाद के सबसे निचले स्तर पर है। वहीं चीन का आयात भी पिछले साल के मुकाबले 1.3 फीसदी घट गया है। निर्यात डाटा में भी 7.3 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है।  वहीं दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था भी इस साल के पहली तिमाही में काफी घट गई थी। 

वैश्विक जीडीपी में 20 बीपीएस की कटौती
मॉर्गन स्टेनली ने मंदी की आहट को देखते हुए वैश्विक जीडीपी में 20 बेसिस प्वाइंट की कटौती कर दी है। एजेंसी ने 2019 के लिए तीन फीसदी और 2020 के लिए विकास दर को 3.2 फीसदी रखा है। 
 

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सिंगापुर का घट गया निर्यात

सिंगापुर की अर्थव्यवस्था में निर्यात का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। यह कुल जीडीपी का 176 फीसदी है। पिछले कुछ महीनों से यह काफी कम हो गया है और 2013 के स्तर पर पहुंच गया है। सिंगापुर के वित्त मंत्री हेंग स्वी कीट ने फेसबुक पोस्ट में कहा कि सरकार ने इस बार जीडीपी के 1.5 फीसदी से 2.5 फीसदी के बीच रहने की उम्मीद जताई है। सरकार पूरे मामले पर गंभीरता से नजर रखे हुए है। 
सिंगापुर का डॉलर, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.1 फीसदी गिर गया है।

चलता रहा ट्रेड वार तो खराब होगी स्थिति

अगर अमेरिका का चीन और भारत से ऐसे ही ट्रेड वार चलता रहा, तो आने वाले समय में इसके भयंकर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल इसके सुलझने के भी किसी तरह की कोई आशा की किरण भी देखने को नहीं मिल रही है।

मंदी से पड़ सकता है भारत पर असर

अगर मंदी आती है तो फिर भारत सरकार के पांच लाख ट्रिलियन इकोनॉमी बनने के सपने पर भी असर पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने इस बार के बजट में इसकी घोषणा भी की थी। 

2008 में ऐसे आई थी मंदी

2008 की मंदी के समय भी कंपनियों में उत्पादन ठप हो गया था और बेरोजगारी का आंकड़ा भी बढ़ गया था। तब लेमेन ब्रदर्स और बैंक ऑफ अमेरिका के दिवालिया होने के बाद अमेरिका से मंदी का जो दौर शुरू हुआ, उसके बाद से पूरा विश्व इसकी गिरफ्त में आ गया था। मंदी से उबरने में कम से कम तीन साल लग गए थे। 
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