नीति आयोग कृषि के मुद्दे पर किसान और उपभोक्ता के बीच कीमतों में अंतर से लेकर कृषकों की आय दोगुना करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर आयोग किसानों को वैज्ञानिक, आधुनिक और तकनीकी सुविधाएं मुहैया कराने के साथ एमएसपी के तीन फार्मूलों पर मंथन कर रहा है। कृषि क्षेत्र की गतिविधियों और भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों समेत अन्य मुद्दों पर पीयूष पांडेय की आयोग के सदस्य रमेश चंद से बातचीत हुई। पेश है बातचीत के मुख्य अंश :
प्रश्न : केंद्र सरकार की कृषि संबंधी सिफारिशों पर राज्य सरकारें ढुलमुल रवैया अपना रही हैं। क्या केंद्र अपनी सिफारिशों को लागू कराने के लिए कोई कदम उठाएगा?
उत्तर - राज्यों में समस्या सिर्फ नियम, तंत्र या कानून में बदलाव के मसले पर सामने आती है। इसमें राज्यों की ओर से लगातार ढुलमुल रवैया अपनाया जा रहा है। जैसे एपीएमसी कानून। जब तक उसमें बदलाव नहीं करते, तब तक भूल जाइए कि बाजार आधुनिक होगा।
राज्य कर भी रहे हैं तो आंशिक रूप से। केंद्र की तर्ज पर ना करके अपने मुताबिक ढाल के कर रहे हैं। किसान संघों को इस पर राज्यों से मांग करनी चाहिए और दबाव बनाना चाहिए। सभी राज्यों के मंत्रियों से बातें हुई। सभी ने हामी भरी। लेकिन अभी भी वो कुछ ना कुछ आंशिक रूप से ही कर रहे हैं। राज्यों को संघीय ढांचे में सभी मुद्दे केंद्र पर नहीं डालने चाहिए। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
प्रश्न - राज्यों के खिलाफ केंद्र कोई सख्त रवैया क्यों नहीं अपनाता?
उत्तर - कुछ सुझाव मेरी ओर से कृषि मंत्रालय को दिए गए थे, जैसे केंद्र की योजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई)। इसमें काफी संसाधन होते हैं। मैंने कहा कि इसको केंद्र की सिफारिशों को लागू कराने के साथ लिंक करिए। लागू करने के लिए वक्त का निर्धारण करिए, अन्यथा केंद्रीय योजना में कमी आएगी।
यह कोई सजा देने वाली बात नहीं, बल्कि प्रेरित करने का मुद्दा है। यह एक तरीका है, लेकिन केंद्र को ये रहता है कि राज्य इसको मुद्दा नहीं बनाएं। हालांकि इसका मकसद डंडा चलाना नहीं है, क्योंकि संघीय ढांचे में ऐसा संभव नहीं। दूसरा यह भी है कि राज्यों के पास अभी संसाधनों की कमी है।
प्रश्न - किसानों और उपभोक्ताओं के बीच कीमत के भारी अंतरों को किस तरह से दूर किया जा सकता है?
उत्तर - लंबे समय से इस पर चर्चा चल रही है पर हकीकत में आज भी किसान आलू बेचता है चार रुपये किलो और उपभोक्ता खरीदता है 20 रुपये प्रति किलो। इसमें दो मॉडल पर काम चल रहा है। एक तरीका यह है कि हम नियमन में बड़े पैमाने पर बदलाव करें और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दें। केंद्र की एपीएमसी समेत अन्य कानूनी प्रावधानों की सिफारिशों को लागू करें और आधुनिक ई-प्लेटफार्म को आगे लाएं। इसके लिए राज्यों को आगे आकर बड़ी होती जा रही परेशानी को खत्म करना चाहिए।