अच्छे मानसून से ही देश की अर्थव्यवस्था सही गति में चलती है। हालांकि इस बार इसकी उम्मीद काफी कम है, क्योंकि मानसून की चाल फिलहाल काफी धीमी है। अभी तक देश में 44 फीसदी कम बारिश हुई है। इससे सूखा पड़ने की आशंका गहराती जा रही है। वहीं इसका असर खेती पर भी देखने को मिलेगा, क्योंकि अभी तक धान और अन्य पैदा होने वाली फसलों की बुवाई भी शुरू नहीं हो पाई है।
मानसून के देर होने से उपभोक्ता कंपनियों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। बारिश न होने से किसान गांवों में उपभोक्ता वस्तुओं को कम खरीद रहे हैं। किसानों का मानना है सूखा पड़ने की स्थिति में उनको आगे मार्च तक का खर्चा इन्हीं पैसों से चलाना पड़ेगा, जो उन्होंने सर्दियों में फसल की पैदावार बेचने के बाद कमाए थे।
केंद्र सरकार के इस बार अच्छी बारिश होना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से वादा किया था, कि अगले पांच सालों में उनकी आमदनी दोगुनी हो जाएगी। इसी वजह से किसानों के लिए सम्मान निधि और पेंशन योजना को शुरू किया गया था। लेकिन मानसून के कमजोर होने से इस पर सरकार की योजना पर असर पड़ सकता है।
कमजोर मानसून से महंगाई बढ़ सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि पैदावार कम होने से अनाज और सब्जियों की कीमतों पर इसका असर देखने को मिलेगा। इससे भारतीय रिजर्व बैंक भी रेपो रेट में बढ़ोतरी कर सकता है। बैंकों को किसानों का कर्ज माफ करना होगा, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है।
तमिलनाडु के कॉर्पोरेट जगत में भी जल संकट का असर दिखने लगा है। इस बीच, पानी की किल्लत से निपटने के लिए आईटी कंपनियों ने अनोखा तरीका खोज निकाला है। कई कंपनियों ने अपने कर्मियों से घर से ही काम करने को कहा है ताकि दफ्तर में पानी की खपत को कम किया जा सके। कंपनियों में केवल उन कर्मचारियों को बुलाया जा रहा है जिनके बिना काम किसी हालत में नहीं हो सकता।