रुपये में गिरावट को लेकर क्या अनुमान?
रिपोर्ट का दावा है कि, भू-राजनीतिक तनाव के समय सामान्य रूप से अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है। इसकी वजह से रुपये समेत उभरते बाजारों की करेंसी पर दबाव पड़ सकता है। बावजूद इसके भारतीय रुपये की कमजोरी आमतौर पर रुकावट डालने वाली नहीं बल्कि व्यवस्थित रही है। भारत के पास एक बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है। चालू खाता घाटा और राजकोषीय घाटा कंट्रोल में है। हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशकों की बाजार से निकासी की वजह से उतार-चढ़ाव हो सकता है। बावजूद इसके 2013 के टेपर टैंट्रम, 2020 के कोविडी-19 महामारी और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी घटनाओं को भारतीय बाजार आसानी से झेल गया। हालांकि वैश्विक तनाव के दौरान रुपया कुछ समय के लिए कमजोर हो सकता है, लेकिन मुद्रा में उतार-चढ़ाव शायद ही कभी भारतीय इक्विटी में लगातार गिरावट में बदला हो।
15 वर्षों में कैसा रहा इक्विटी बाजार का हाल?
रिपोर्ट बताती है कि पिछले 15 वर्षों में भारतीय इक्विटी बाजार में यह देखने को मिल कि, युद्ध व तनाव के दौरान बाजार में शॉर्ट टर्म यानी कुछ समय के लिए का उतार-चढ़ाव रहा, लेकिन फंडामेंटल्स में स्थिरता आने के बाद बाजार में सुधार हुआ।
- अरब स्प्रिंग / मिडिल ईस्ट में अशांति (2011): उतार-चढ़ाव वाला साल लेकिन जियोपॉलिटिक्स से ज्यादा ग्लोबल ग्रोथ के डर से प्रेरित रहा। घरेलू फंडामेंटल्स के स्थिर होने पर बाजारों में सुधार हुआ।
- क्रीमिया संघर्ष (2014): वैश्विक तनाव के बावजूद, निफ्टी 50 ने उस साल 31% रिटर्न दिया, जिसकी वजह सुधार की उम्मीद थी।
- उरी सर्जिकल स्ट्राइक (2016): थोड़ी बिकवाली देखने को मिली, जिसके बाद रिकवरी हुई; अगले साल निफ्टी 50 और ऊपर गया।
- बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019): बाजार पर कम समय का असर; निफ्टी 50 ने साल का अंत 12% की बढ़त के साथ किया।
- रूस-यूक्रेन युद्ध (2022): हमले के दिन निफ्टी-50 पांच फीसदी गिरा, लेकिन तेल के झटकों और ग्लोबल रेट में तेजी से बढ़ोतरी के बावजूद, साल का अंत सकारात्मक रहा।
- इस्राइल-हमास संघर्ष (2023): हाई-टेंशन वाले दिनों में शुरुआती गिरावट एक प्रतिशित से कम रही; तेल की कीमतों के बढ़ने का डर कम होने पर बाजार जल्दी स्थिर हो गए।
- ऑपरेशन सिंदूर (2025): शुरुआती मार्केट की घबराहट के बाद स्थिरता आई क्योंकि संघर्ष बढ़ने का खतरा कम रहा।
घरेलू बाजार किन-किन कारकों पर निर्भर करता है?
एक बार जब यह साफ हो जाता है कि सप्लाई में रुकावटें मैनेज की जा सकती हैं, पॉलिसी फ्रेमवर्क बने रहते हैं और ग्रोथ में कोई स्ट्रक्चरल कमी नहीं है, तो रिस्क प्रीमियम कम हो जाते हैं। भारत के लिए, जहां ग्रोथ घरेलू खपत, कैपेक्स रिकवरी, डिजिटाइजेशन और मैन्युफैक्चरिंग से चलती है, जियोपॉलिटिकल झटके आम रुकावटें हैं और इन्फ्लेक्शन मुद्दा नहीं है।