वेनेजुएला में हालिया घटनाक्रम का कच्चे तेल की कीमतों पर निकट अवधि में कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। क्रिसिल रेटिंग्स ने यह दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक आपूर्ति में वेनेजुएला की हिस्सेदारी बेहद कम है।
क्रिसिल ने कहा कि भारत के लिए भी वेनेजुएला के घटनाक्रम का व्यापार या कंपनियों की क्रेडिट क्वालिटी पर कोई खास असर नहीं दिखता। भारत के कुल आयात में वेनेजुएला से आने वाला हिस्सा 0.25% से कम है। वित्त वर्ष 2025 में करीब 14,000 करोड़ रुपये के आयात में 90% से अधिक कच्चा तेल था, जबकि वेनेजुएला भारत की कुल कच्चे तेल जरूरत का लगभग 1% ही सप्लाई करता है।
हालांकि, एजेंसी ने यह भी जोड़ा कि मध्यम से लंबी अवधि में अगर वेनेजुएला के बड़े अप्रयुक्त भंडारों में निवेश बढ़ता है, तो वैश्विक आपूर्ति बढ़ सकती है और इससे तेल कीमतें नरम पड़ना भारतीय कंपनियों के लिए सकारात्मक हो सकता है।
इसी बीच, एक यूरोपीय थिंक टैंक ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (सीआरईए) की रिपोर्ट में कहा गया कि दिसंबर 2025 में भारत रूसी जीवाश्म ईंधन का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया। इससे पहले भारत दूसरे स्थान पर था। दिसंबर में भारत का रूसी हाइड्रोकार्बन आयात 2.3 अरब यूरो रहा, जो नवंबर के 3.3 अरब यूरो से कम है। तुर्किये ने भारत को पीछे छोड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल किया, जबकि चीन शीर्ष पर बना रहा।
सीआरईए के अनुसार, दिसंबर में भारत के रूसी आयात में 78% हिस्सा कच्चे तेल का था (1.8 अरब यूरो), जबकि कोयला और तेल उत्पादों का हिस्सा शेष रहा। नवंबर की तुलना में रूसी कच्चे तेल का आयात महीने-दर-महीने 29% घटकर प्राइस कैप नीति लागू होने के बाद के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि आयात में यह गिरावट मुख्य रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी के कारण आई। इसने दिसंबर में रूस से आयात आधा कर दिया। रिलायंस की आपूर्ति रूस की रोसनेफ्ट से थी, जो अमेरिकी विदेश संपत्ति नियंत्रण कार्यकाल (ओएफएसी) प्रतिबंध लागू होने से पहले खरीदे गए कार्गो पर आधारित थी।
इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों ने भी दिसंबर में रूसी आयात 15% घटाया। अमेरिका द्वारा रूस की प्रमुख तेल कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते कुछ भारतीय रिफाइनरियों ने आयात रोक या कम कर दिया है, जबकि गैर-प्रतिबंधित रूसी कंपनियों से खरीद जारी है।