भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में पिछले दो दशकों में ऋण वितरण के तौर-तरीकों में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिला है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, देश में असुरक्षित ऋण का आंकड़ा 46.9 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। बिना किसी गिरवी या कोलेटरल के दिए जाने वाले इन कर्जों में हुई इस बेतहाशा बढ़ोतरी ने बैंकिंग सिस्टम में जोखिम को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2005 में असुरक्षित ऋणों का कुल आकार मात्र दो लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 46.9 लाख करोड़ रुपये हो गया है। कुल बैंक ऋण में असुरक्षित लोन की हिस्सेदारी में भी भारी इजाफा हुआ है।
आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि असुरक्षित ऋण बांटने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की भूमिका सबसे अहम रही है। वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार-
यह डेटा बैंकों के लेंडिंग पोर्टफोलियो में आए बदलाव की जानकारी देता है। इसमें सुरक्षित लोन के मुकाबले असुरक्षित लोन का विस्तार काफी तेजी से हुआ है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी दिसंबर 2025 में जारी अपनी फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट (एफएसआर) में इस मुद्दे को उठाया था। केंद्रीय बैंक के अनुसार, फिनटेक लेंडर्स की लोन बुक में असुरक्षित ऋणों का हिस्सा 70 प्रतिशत से अधिक है।
चिंता की बात यह है कि फिनटेक द्वारा दिए गए इन कर्जों में से आधे से अधिक 35 वर्ष से कम आयु के उधारकर्ताओं को दिए गए हैं, जो युवा वर्ग के बीच बढ़ते कर्ज के जोखिम दिखाते हैं। हालांकि, RBI ने यह भी बताया कि बैंकों और एनबीएफसी में असुरक्षित बिजनेस लोन मुख्य रूप से उच्च गुणवत्ता वाले उधारकर्ताओं के पास हैं, जो एसेट क्वालिटी के लिहाज से अच्छी बात है।
असुरक्षित ऋणों में भारी उछाल के बावजूद, बैंकिंग सेक्टर के लिए एक सकारात्मक खबर यह है कि बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात (एनपीए), जो 2018 में 11.46 प्रतिशत के शिखर पर था, 2025 में घटकर 2.31 प्रतिशत रह गया है।