बजट 2020 के पेश होने से पहले स्टेनलेस स्टील सेक्टर से जुड़ी कंपनियों ने सरकार से बेसिक कस्टम ड्यूटी को कम करने की मांग की है। इसके साथ ही देश में स्टेनलेस स्टील की हिस्सेदारी को बढ़ाने पर सरकार द्वारा जोर देने की बात कही है, ताकि इसकी मांग में इजाफा हो।
शर्मा ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था को पांच ख़रब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने में स्टेनलेस स्टील की अहम भूमिका होगी। भारतीय सरकार द्वारा अधिकृत नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पॉलिसी (एनआईपी) इस दिशा में एक आशाजनक कदम है। हाल ही में भारत द्वारा आरसेप (RCEP) संधि पर आपत्ति जताए जाने और विचार-विमर्श से वापसी, घरेलू उद्योग के लिए एक रिहायती कदम था।
भारतीय स्टेनलेस स्टील उद्योग कईं समस्याओं से जूझ रहा है। शर्मा ने बताया कि 'कॉस्ट ऑफ़ कैपिटल' और 'लोजिस्टिक्स कॉस्ट' में तीव्रता से भारत में स्टेनलेस स्टील को चीन, इंडोनेशिया, इत्यादि जैसे अत्यधिक उत्पाद वाले देशों से होने वाले अनियमित निर्यात से काफी दिक्कतों का सामना करना प़ड़ रहा है।
भारतीय कंपनियां फिलहाल इनसे कम कीमत पर अपने उत्पादों को नहीं बेच पा रही हैं, जिसका असर उत्पादन और मांग पर पड़ रहा है। भारतीय कंपनियां जिस स्टेनलेस स्टील का निर्माण करती हैं वो अन्य देशों के मुकाबले काफी अच्छा है। लेकिन भारत के द्वारा स्वीकृत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (एफटीए) वाले देशों से बढ़ते आयात के चलते भारतीय स्टेनलेस स्टील उद्योग अपनी पूर्ण स्थापित क्षमता का केवल 55-60 फीसदी उपयोग ही कर पा रहा है। ऐसे में भारतीय उत्पादकों को वैश्विक रूप से एक समतल व्यापारिक स्तर मिलना चाहिए।
भारत के 7,500 किमी विराट समुद्र-तट को एक स्थायी और भरोसेमंद धातु की ज़रूरत है क्यूंकि यहाँ क्षरण का खतरा ज़्यादा होता है। स्टेनलेस स्टील अपनी बहु-रुपी खूबियों के साथ इस चुनौती पर ख़रा उतरता है। हमें उम्मीद है कि आगामी बजट में वित्त मंत्रालय भारतीय उद्योग की चुनौतियों को समझकर, उत्तम उपाय सांझा करेगा।