वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सीधा असर अब दुनिया भर की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक अनुमानों पर स्पष्ट रूप से पड़ने लगा है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने हाल ही में वैश्विक आर्थिक झटकों का हवाला देते हुए वर्ष 2026 के लिए भारत की विकास दर (जीडीपी) के अनुमान को 6.6 प्रतिशत से घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (यूएन डीईएसए) द्वारा मंगलवार को जारी की गई नवीनतम रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि विकास दर के इस अनुमानित संशोधन के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना रहेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक नया झटका साबित हो रहा है, जिसने विकास की रफ्तार को धीमा करने के साथ-साथ महंगाई के दबाव को फिर से बढ़ा दिया है। वर्ष 2025 में दर्ज 7.5 प्रतिशत की विकास दर से 2026 में 6.4 प्रतिशत तक की यह गिरावट मुख्य रूप से ऊर्जा आयात की बढ़ती लागत और सख्त होती वित्तीय स्थितियों के दबाव को दर्शाती है। यूएन डीईएसए में आर्थिक विश्लेषण और नीति प्रभाग के प्रभारी व वरिष्ठ अर्थशास्त्री इंगो पीटरले ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया का यह झटका सभी देशों में विकास को कम कर रहा है और महंगाई बढ़ा रहा है, जिससे नीति निर्माताओं के लिए गुंजाइश सीमित हो रही है। वैश्विक स्तर पर भी हालात चिंताजनक हैं, जहां 2026 के लिए वैश्विक जीडीपी वृद्धि का अनुमान अब महज 2.5 प्रतिशत आंका गया है, जो जनवरी के अनुमान से 0.2 प्रतिशत अंक कम है और महामारी से पहले के सामान्य स्तर से काफी नीचे है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत भी पूरी तरह सुरक्षित या इन झटकों से अछूता नहीं है। पीटरले के मुताबिक, भारत एक बड़ा ऊर्जा आयातक देश है, जिसके कारण यह विदेशी धन प्रेषण (रेमिटेंस) और अन्य वैश्विक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही वित्तीय सख्ती भारत के लिए मौद्रिक नीति के संचालन को और अधिक जटिल बना सकती है। यूएन डीईएसए के निदेशक शांतनु मुखर्जी ने व्यापार के मोर्चे पर एक दीर्घकालिक संरचनात्मक मुद्दे की ओर इशारा करते हुए बताया कि जब आयात लागत बढ़ती है तो निर्यात पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है। जब फ्रेट लागत, लॉजिस्टिक्स और डीजल जैसे पेट्रोकेमिकल्स के दाम बढ़ते हैं, तो व्यवसायों के लिए लागत में वृद्धि होना तय है।
तमाम बाहरी दबावों और ऊर्जा आयात की बढ़ती लागत के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार बेहद मजबूत स्थिति में हैं। इंगो पीटरले ने भारत के विकास को संरचनात्मक रूप से बेहद मजबूत बताया है। यह मजबूती मुख्य रूप से बेहतर उपभोक्ता मांग, लगातार हो रहे सार्वजनिक निवेश और सेवा निर्यात के शानदार प्रदर्शन पर टिकी है। अर्थव्यवस्था को गति देने वाले ये प्रमुख कारक आने वाले समय में भी काफी हद तक बरकरार रहने की उम्मीद है, जिससे भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की सूची में मजबूती से अपना स्थान बनाए रखेगा। मुखर्जी ने भी विश्वास जताया है कि अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत के पास इन झटकों को प्रबंधित करने के लिए पर्याप्त पॉलिसी स्पेस मौजूद है।