भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) हो चुका है। इसके तहत ब्रिटेन पहली बार भारतीय कंपनियों को सरकारी खरीद प्रणाली में बिना किसी भेदभाव के हिस्सा लेने की अनुमति देगा। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
दोनों देशों ने छह मई को एफटीए पर वार्ता खत्म की है। इस समझौते को अगले साल लागू किया जाएगा। अधिकारी ने कहा, 'पहली बार ब्रिटेन ने 'सामाजिक मूल्य' कानून (सोशल वैल्यू) के तहत हमारे आपूर्तिकर्ताओं (भारतीय कंपनियों) के लिए अपनी सरकारी खरीद प्रणाली में समान अवसर सुनिश्चित करने का वादा किया है।' ब्रिटेन के सामाजिक मूल्य कानून के तहत सरकारी विभागों को सरकारी अनुबंधों में आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं का ध्यान रखना होता है और इस बार भारतीय कंपनियों को भी इस प्रणाली में समान रूप से शामिल किया जाएगा।
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ब्रिटेन सरकार के मुताबिक, यह व्यापार समझौता ब्रिटेन की कंपनियों को भारत के सरकारी खरीद बाजार में अद्वितीय और अभूतपूर्व पहुंच प्रदान करेगा, जिसमें करीब 40,000 टेंडर होंगे, जिनकी कुल कीमत हर साल 38 बिलियन पाउंड (लगभग 4 लाख करोड़ रुपये) होगी। दूसरी ओर, भारत ने ब्रिटिश कंपनियों को केवल गैर-संवेदनशील क्षेत्रों में सरकारी खरीद में हिस्सा लेने की अनुमति दी है। हालांकि, ब्रिटेन की कंपनियों को राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के टेंडरों में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी।
उन्होंने बताया कि ब्रिटेन की कंपनियों को केवल 200 करोड़ रुपये से ऊपर के टेंडरों में भाग लेने की अनुमति होगी और उन्हें भारतीय खरीद प्रणाली में द्वितीय श्रणी का स्थानीय आपूर्तिकर्ता माना जाएगा। इसका मतलब है कि उन्हें भारतीय कंपनियों के बराबर दर्जा मिलेगा, लेकिन कुछ विशेष नियमों के तहत। साथ ही, भारत की मेक इन इंडिया नीति और छोटे और मंझोले उद्योगों को समर्थन देने के लिए कुछ विशेष छूट दी गई है।
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पहले, भारत ने यूएई के साथ हुए एफटीए में सरकारी खरीद क्षेत्र को खोला था। उस समझौते के तहत, यूएई की कंपनियों को 200 करोड़ रूपये से ऊपर के टेंडरों में भाग लेने की अनुमति दी गई थी। 2020 में, सरकार ने सार्वजनिक खरीद के नियमों में बदलाव किया, ताकि उन कंपनियों को अधिक प्राथमिकता दी जा सके, जिनके उत्पादों और सेवाओं में 50 फीसदी या उससे अधिक स्थानीय सामग्री हो, ताकि 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा मिल सके।