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Trump tariffs: ट्रंप के 25 प्रतिशत टैरिफ से भारत की जीडीपी पर दबाव पड़ने की आशंका, निर्यात होगा प्रभावित

Thu, 31 Jul 2025 05:39 PM IST
नविता स्वरूप बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

बुधवार को ट्रंप ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की। अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात जीडीपी का 2.2 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि टैरिफ से जुड़ी घटनाक्रम का प्रत्यक्ष प्रभाव गंभीर होगा। बाजार के विशेषज्ञों ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की।
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अमेरिका ने भारत पर लगाया 25% टैरिफ - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के भारत पर रूस के साथ व्यापाार करने के लिए 25 प्रतिशत का टैरिफ और अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाने के निर्णय से आर्थिक विकास में कुछ कमी आएगी। कपड़ा, दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न एवं आभूषण, कृषि उत्पाद और मशीनरी जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर इसका असर पड़ने की आशंका है।

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दोनों देशों का व्यापार समझौता तेजी से होने की उम्मीद
बाजार के विशेषज्ञों ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनका कहना है कि भारतीय रुपए में आई कमजोरी अगर आगे बनी रहती है, तो वैश्विक स्तर पर भारतीय वस्तुओं की मूल्य प्रतिस्पर्धा में सुधार करके इसके प्रभाव को कम कर सकती है। वहीं दोनों देशों द्वारा द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए तेजी से चर्चा शुरू करने की उम्मीद है। यह बातचीत सितंबर और अक्टूबर में समाप्त हो सकती है, जिससे भारत को दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।
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जीडीपी में 20 से 30 आधार अंकों की गिरावट आने का अनुमान
मॉर्गन स्टेनली के अनुसार कुल मिलाकर अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात जीडीपी का 2.2 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि टैरिफ से जुड़ी घटनाक्रम का प्रत्यक्ष प्रभाव गंभीर होगा। साथ ही अगले दौर की वार्ता के घटानक्रम पर नजर रखने की जरूरत है। 

एजेंल वन के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अगर सितंबर या अक्टूबर में व्यापार वार्ता समाप्त होने तक टैरिफ जारी रहता है, तो वित्त वर्ष 2026 के जीडीपी में 20 आधार अंकों की गिरावट आ सकती है। हमारा मानना है कि यह टैरिफ थोड़े समय के लिए ही लागू रहने की उम्मीद है, क्योंकि दोनों देशों व्यापार समझौते को जल्द पूरा कर सकते हैं। 

डैम कैपिटल के अनुसार अगर अंधिकांश प्रतिकूल प्रभाव घटित होते हैं तो सबसे खराब स्थिति यह होगी कि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में 30 आधार अंकों की गिरावट आएगी।

निर्यातकों को ऑडर कैंसल होने का डर
स्मॉलकेस के मैनेजर और ग्रोथइंवेस्टिंग के संथापक नरेंद्र सिंह का कहना है कि  भारत अमेरिका को अरबों डॉलर का माल भेजते हैं। अब यह आचानक आई प्रतिस्पर्धात्मकता में भारी गिरावट का सामना कर रहे हैं। सूरत और गुजरात जैसे निर्यातकों के लिए इस घोषणा का मतलब है कि उनके ऑर्डर कैंसल हो सकते हैं। साथ ही मार्जिन पर दबाव और नौकरी की अनिश्चितता बढ़ने की संभावना है। वे कहते हैं कि एप्पल की विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी कंपनियों को भी इसका असर महसूस हो सकता है। जल्द तो नहीं लेकिन कमजोर मांग और अमेरिकी सोर्सिंग रणनीतियों में बदलाव के कारण उनपर असर होगा। अच्छी बात यह है कि फार्मा और ऊर्जा निर्यात फिलहाल सुरक्षित दिख रहे हैं, जिसमें कुछ राहत मिली है। 

बाजार हुआ सतर्क
कुल मिलाकर यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब भारत मजबूत निर्यात गति बना रहा था। यह न केवल मिड कैप निर्यातकों की निकट भविष्य की आय और निवेश योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। बल्कि हमारी दीर्घकालिक व्यापार रणनीति पर भी नए सवाल खड़े करता है। बाजार की प्रतिक्रिया पहले से ही सतर्क हो चुकी है और जब तक कोई नीतिगत प्रतिक्रिया नहीं होती, तो आनेवाली तिमाहियों में इसका असर देखने को मिलेगा।

अमेरिका भारत के बड़े व्यापार साझेदारों में से एक
वेंचुरा के रिसर्च प्रमुख विनीत बोलिंजकर कहते हैं कि भारत के सबसे बड़े व्यापार साझेदार अमेरिका ने 2024 में 75 अरब डॉलर (फार्मा को छोड़कर ) के वस्तु के निर्यात में योगदान दिया है। निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता चुनौतिपूर्ण हैं, लेकिन भारत, चीन और वियतनाम के मुकाबले अपनी हिस्सेदारी बनाए रख सकता है, जिन पर क्रमश: 54 और 46 प्रतिशत का उच्च टैरिफ है। फार्मा को छूट दी गई है, हालांकि काट्सा से जुड़े व्यापक प्रतिबंध अनिश्चता को बढ़ाते हैं। अपने व्यापार और आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए भारत को निर्यात विविधीकरण और अन्य देशों के साथ व्यापार वार्ता में तेजी लानी होगी।

काट्सा, यानी "काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट", एक अमेरिकी कानून है जो ईरान, उत्तर कोरिया और रूस जैसे देशों के साथ व्यापार करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाता है।
 
भारतीय अर्थव्यवस्था ने पहले भी ऐसी परेशानियां देखी
स्मॉलकेस मैनेजर और क्वांटस रिसर्च के संस्थापक कार्तिक जोंगडला कहते हैं कि वॉशिंगटन का 25 प्रतिशत का व्यापक टैरिफ नाटकीय है, लेकिन भारतीय व्यापार ने पहले भी इसकी तरह के तीखे प्रहार झेले हैं। 1998 में पोखरीण 2 परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने ग्लेन संशोधन प्रतिबंध लगाए, फिर भी भारत का अमेरिका को निर्यात 1998 में लगभग 7 अरब डॉलर से बढ़कर 2008 तक 21 अरब डॉलर से अधिक रहा, जबकि उस दशक में  जीडीपी की वृद्धि 7 प्रतिशत रही।

व्यापार वार्ता से नरम रुख की संभावना 
उन्होंने बताया कि वर्तमान में लगाए गए शुल्क उच्च मूल्य वाले रत्नों, जेनेरिक दावाओं और परिधानों क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन मैक्र ड्रैग अभी भी वित्त 2026 के सकल घरेलू उत्पाद के 40 से 50 आधार अंकों पर सीमित दिखाता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि व्हाइट हाउस ने रूसी तेल से जुड़ा अतरिक्त जुर्माना कितना होगा इसकी एचएस कोड सूची दर जारी नहीं की है। इससे यह संकेत मिलता है कि जो व्यापार वार्ता अभी बाकी है और उसके सामाप्त होने के बाद यह रुख नरम हो जाएगा।

भारत खुद संभाल लेगा
कार्तिक कहते हैं निकट भविष्य में अस्थिरता बनी रहेगी, इक्वटी जोखिम प्रीमियम में वृद्धि, रुपया 87 तक गिर सकता है, लेकिन घरेलू तरलता बनी हुई है (₹29,000 करोड़ मासिक एसआईपी प्रवाह) और नीतिगत बफर पर्याप्त है। भारत सरकार पीएलआई प्रोत्साहनों में तेजी ला सकती, एसएमई के लिए शुल्क वापसी बढ़ा सकती है और निर्यातकों को राहत देने के लिए यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों के साथ सौदों को तेज कर सकती है। कुल मिलाकर यह एक गतिरोधक है, यू-टर्न नहीं है।

भारत का आर्थिक लचीलापन ही है उसकी ताकत
गोलफाई के संस्थापक रॉबिन आर्य कहते हैं कि भारत की असली ताकत उसका आर्थिक लचीलापन है, एक विशाल, विविध घरेलू अर्थव्यवस्था और मजबूत बुनियादी ढांचा वैश्विक अनिश्चितता के दौर में एक ठोस आधार प्रदान करता है। भले ही अमेरिका 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाने की घोषणा की है, लेकिन बाजार ने इसका अनुमान पहले ही लगा लिया है और संभावित प्रभाव का आंकलन भी कर लिया है, जिससे नकारात्मक जोखिम सीमित हो गया है। हालांकि कुछ क्षेत्र को अल्पकालिक दबाव का सामना करना पड़ेगा, लेकिन भारत का व्यापक विकास इंजन और स्थिरता इन प्रभावों को कम कर देगा।
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वे कहते हैं कि अमेरिकी निर्यात भारत के जीडीपी का लगभग दो प्रतिशत है। नीति निर्माता अपनी रणनीतियों में निर्यातकों का समर्थन करेंगे और नई वैश्विक साझेदारीयों (जिसमें हाल में हुई भारत-यूके एफटीए) की तलाश करेंगे। मजबूत घरेलू मांग के साथ हमें विश्वास है कि भारत इस चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है और दीर्घकालिक विकास के अवसरों का लाभ उठाता रहेगा।

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