जीएसटी के जरिये सरकार कर संग्रह प्रक्रिया आसान बनाना चाहती थी लेकिन इसमें पांच दरों (0.25, 5, 12, 18, 28 फीसदी) ने वस्तु/सेवा के वर्गीकरण को जटिल बना दिया। मासिक, तिमाही और सालाना जैसे रिटर्न ने प्रक्रिया और पेचीदा कर दिया।
व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी परिषद की अब तक हुई 40 बैठकों में सैकड़ों संशोधन के बावजूद जटिलता बढ़ती जा रही है। इसके अलावा 2 फीसदी जीडीपी बढ़ने की उम्मीदों को भी झटका लगा है। 2019-20 में विकास दर 11 साल में सबसे कम रही। 2017-18 में यह 7.2 फीसदी थी, जो 2018-19 में 6.8 फीसदी और बीते साल 4.2 फीसदी रह गई।
जीएसटी के बाद देशभर में करोड़ों नए कारोबारियों ने पंजीकरण कराया और करदाताओं की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ। हालांकि, कर संग्रह के मोर्चे पर यह बढ़त सिर्फ आंकड़ों में सीमित रह गई। लेकिन टैक्स चोरी जैसी गतिविधियों पर लगाम लगी है। कारोबारी अब टैक्स रिटर्न डिजिटल तरीके से भरते हैं और ग्राहकों को दिए गए बिल में जीएसटी का विवरण देना होता है। इससे पारदर्शिता बढ़ी और टैक्स चोरी कम हुई।