औद्योगिक मांग और आर्थिक स्थिति है वजह
फिच समूह के इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च के प्रिंसिपल इकॉनमिस्ट सुनील कुमार सिन्हा ने कहा कि डिस्काम की करीब 60 फीसदी बिजली औद्योगिक ग्राहक ही खरीदते हैं और इनसे ही उन्हें असल में फायदा होता है।
घरेलू और कृषि कनेक्शन को तो रियायती दर पर बिजली मिलती है। बीते दिसंबर में समाप्त हुई तिमाही में देखें, तो औद्योगिक उत्पादन में वृद्घि दर गिरकर 6.6 फीसदी पर आ गई है, जो बीते छह तिमाही का न्यूनतम स्तर है। डिस्काम की आर्थिक हालत पहले से ही खस्ता है, इसलिए वह इन हालात में ज्यादा बिजली खरीद नहीं सकते।
कोयला का स्टॉक बढ़ा
आम तौर पर कोयले का स्टॉक नहीं होने की वजह से बिजली कंपनियां कम बिजली बना पाती हैं। लेकिन इस समय न सिर्फ कोल इंडिया लिमिटेड की तरफ से कोयले की सामान्य आपूर्ति हो रही है, बल्कि रेलवे की तरफ से भी कोयले की ढुलाई के लिए पर्याप्त संख्या में मालगाड़ी के रैक उपलब्ध कराये जा रहे हैं।
स्थिति यह है कि एनटीपीसी के दादरी थर्मल पावर प्लांट में 36 दिन का कोयला है, जबकि रोपड़ के थर्मल पावर प्लांट में तो 75 दिन तक के कोयले का स्टॉक है। बिजली की मांग नहीं होने से थर्मल पावर स्टेशन में कम बिजली बनाई जा रही है। बीते मार्च में उत्तरी क्षेत्र की थर्मल पावर कंपनियों का प्लांट लोड फैक्टर महज 52.43 फीसदी था जबकि इससे एक साल पहले इसी महीने यह 60.96 फीसदी था।