156 वर्ष पुराने समूह में आपसी खींचातानी क्यों बढ़ी?
सूत्रों के अनुसार, टाटा समूह में ताजा विवाद का मुख्य कारण टाटा संस के बोर्ड की सीटें हैं। जो 156 वर्ष पुराने समूह को नियंत्रित करती है। इसमें 30 सूचीबद्ध कंपनियों सहित लगभग 400 कंपनियां शामिल हैं। इस विवाद पर टाटा ट्रस्ट्स के छह ट्रस्टियों की बैठक के दौरान चर्चा होने का अनुमान है। यह ट्रस्ट्स सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और रतन टाटा ट्रस्ट सहित कई धर्मार्थ ट्रस्टों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक प्रमुख समूह है।
11 सितंबर 2025 की बैठक में कहां फंसा था पेंच?
इससे पहले 11 सितंबर को हुई बैठक पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा संस बोर्ड में नामित निदेशक के रूप में पुनः नियुक्त करने पर विचार करने के लिए बुलाई गई थी। टाटा ट्रस्ट्स के सात ट्रस्टी हैं। इनमें सिंह भी शामिल हैं। सिंह 11 सितंबर की बैठक में शामिल नहीं हुए क्योंकि उनका बोर्ड में फिर से नामांकन एजेंडे में था। अक्तूबर 2024 में रतन टाटा की मौत के बाद टाटा ट्रस्ट्स ने एक नीति पेश की थी। इसके तहत टाटा संस बोर्ड में नामित निदेशकों की 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर सालाना आधार पर उनके शामिल होने या नहीं होने पर फैसला लेने को जरूरी बना दिया गया था।
11 सितंबर की बैठक में 77 वर्षीय पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह- जो 2012 से निदेशक और 2018 से ट्रस्टी थे- की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन (टीवीएस समूह के मानद अध्यक्ष) की ओर से किया गया था। चार अन्य ट्रस्टियों- मेहली मिस्त्री, प्रमित झावेरी, जहांगीर एचसी जहांगीर और डेरियस खंबाटा- ने इस कदम का विरोध किया। इसके कारण प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद चार ट्रस्टियों ने मेहली मिस्त्री को टाटा संस बोर्ड में नामित करने की मांग की। लेकिन नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन ने इस कदम का विरोध किया और टाटा के मूल्यों के अनुसार पारदर्शी प्रक्रिया की जरूरत पर बल दिया। इसके बाद सिंह ने स्वेच्छा से टाटा संस बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था।