जब कोई कंपनी दिवालिया होने की कगार पर हो और उसके खिलाफ रिकवरी की कार्यवाही रुकी हुई हो, तो क्या उसके द्वारा दिए गए चेक के बाउंस होने पर भी उसे कानूनी छूट मिलेगी? भारत के कॉरपोरेट और बैंकिंग जगत से जुड़े इस बेहद अहम सवाल को सुप्रीम कोर्ट ने अब 3 जजों की एक बड़ी बेंच के पास विचार के लिए भेज दिया है।
दिवालिया कानून के तहत, जब भी किसी डिफाल्टर कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके खिलाफ चल रहे सभी रिकवरी मामलों पर रोक लगा दी जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य कंपनी की संपत्तियों को बचाना होता है, ताकि या तो कंपनी को दोबारा खड़ा किया जा सके या फिर संपत्तियों को बेचकर लेनदारों का पैसा चुकाया जा सके।
हाल ही में 'दिनेशचंद सुराणा बनाम यूको बैंक' मामले में यह विवाद उठा कि क्या कोई व्यक्ति अपनी पर्सनल इन्सॉल्वेंसी के दौरान चेक बाउंस के तहत चल रहे आपराधिक मुकदमों को रोकने के लिए इस मोरेटोरियम का ढाल के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की 2 जजों की बेंच ने इस मामले पर बुधवार को अपना फैसला सुनाया। जस्टिस पारदीवाला ने 151 पन्नों का विस्तृत फैसला लिखते हुए इस मामले को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास तीन जजों की बेंच गठित करने के लिए भेजा है।
अब तीन जजों की बड़ी बेंच मुख्य रूप से इन दो सवालों के जवाब तलाशेगी:
कोर्ट ने अपने फैसले में यह माना है कि चेक बाउंस मामले का जो मुआवजे वाला हिस्सा है, वह एक तरह का 'सिविल' उपाय है। अगर इस पर मोरेटोरियम लागू नहीं किया गया, तो डिफाल्टर की संपत्ति खत्म हो सकती है, जिससे अन्य सभी लेनदारों को नुकसान होगा। इसलिए केवल मुआवजे की रिकवरी वाले हिस्से पर मोरेटोरियम लागू होना चाहिए।
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पर्सनल इन्सॉल्वेंसी के मामलों में कंपनी के डायरेक्टर्स पर भी मुआवजे के भुगतान को लेकर आईबीसी की धारा 96 और 101 के तहत मोरेटोरियम लागू होगा।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच पर टिकी हैं। यह अंतिम फैसला न केवल बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए अहम होगा, बल्कि उन कॉरपोरेट डायरेक्टर्स की जिम्मेदारियां भी तय करेगा जो दिवालिया प्रक्रिया के पीछे छिपकर चेक बाउंस के आपराधिक मामलों से बचने की कोशिश करते हैं।